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उच्च शिक्षा, बढ़िया जॉब… फिर भी भटक गई राह जांच एजेंसियां चौकन्नी।

8 लाख रुपये बने मुसीबत: नदीम से दोस्ती ने डुबो दी ज़िंदगी

क्राइम इंडिया टीवी डिजिटल डेस्क। मनोज कुमार सोनी 

दिल्ली में संदिग्ध ब्लास्ट साजिश से जुड़े केस में अहम मोड़ आया है। रोहतक की रहने वाली और पुलवामा के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में लेक्चरर के रूप में तैनात डॉक्टर प्रियंका शर्मा को जांच एजेंसी ने गिरफ्तार कर लिया है। बताया जा रहा है कि वह आरोपी नदीम के संपर्क में थीं, जिसे दिल्ली में आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, नदीम और प्रियंका की मुलाकात मेडिकल जगत से जुड़े कार्यक्रमों के जरिये हुई थी। बातचीत बढ़ती गई और दोनों संपर्क में बने रहे। इसी बीच नदीम ने प्रियंका से आर्थिक मदद की बात कही। उसने कहा कि उसे किसी निजी परेशानी के कारण तुरंत पैसे की जरूरत है।

इसी भरोसे में डॉक्टर प्रियंका ने कथित तौर पर नदीम के अकाउंट में लगभग 8 लाख रुपये भेज दिए। जांच एजेंसियों का दावा है कि यही रकम आगे जाकर मेवात में विस्फोटक सामग्री खरीदने के उद्देश्य से उपयोग में लाई गई। इसी लिंक के आधार पर प्रियंका को भी आरोपियों की सूची में शामिल किया गया है।

जांच में यह भी सामने आया है कि प्रियंका को शायद नदीम की मंशा का अंदाज़ा नहीं था। परंतु, किसी भी आतंकी फंडिंग मामले में कानून बेहद कठोर रहता है — चाहे राशि अज्ञानता में ही क्यों न दी गई हो। इसी कारण उनके खिलाफ भी वही धाराएं लगाई गई हैं, जो आतंकवाद वित्त पोषण मामलों में लागू होती हैं।

यह घटना एक बड़े प्रश्न को जन्म देती है

क्या गलत संगत या गलत भरोसा किसी व्यक्ति का पूरा भविष्य बर्बाद कर सकता है? डॉक्टर प्रियंका मेडिकल क्षेत्र में एक ऊँचे स्थान तक पहुँचीं। माता-पिता ने कठिन परिश्रम से उन्हें एमबीबीएस और फिर एमडी की शिक्षा दिलाई। सरकारी मेडिकल कॉलेज में नौकरी मिली — यानी करियर बुलंदी पर था। लेकिन अब वही करियर और प्रतिष्ठा एक गंभीर कानूनी मामले की गिरफ्त में दिखाई दे रही है।

जांच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि
प्रियंका ने यह काम किसी दबाव में किया या विश्वास के चलते?
▪ क्या उन्हें असल मंशा का पता था?
▪ या फिर वे केवल एक बड़े षड्यंत्र की शिकार बन गईं?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है

आपराधिक मंशा न होने पर भी, संवेदनशील मामलों में लापरवाही भारी पड़ सकती है। कानून अज्ञानता को आधार बनाकर दोषमुक्त नहीं करता। इस केस ने समाज के सामने एक बड़ा संदेश रखा है बेहतर शिक्षा, अच्छा पद और एक सम्मानित जीवन…सब कुछ खतरे में पड़ सकता है यदि हम यह पहचानने में गलती कर दें कि किसे अपना भरोसा दें।

अब पूरे मामले में न्यायालय ही तय करेगा कि डॉक्टर प्रियंका की भूमिका कितनी जानबूझकर और कितनी अनजाने में रही। लेकिन इतना तय है संगत, संपर्क और भरोसा  जीवन बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है।

घर दूर रहकर भटकती पीढ़ी पर बड़ा सवाल

आजकल के युवा पढ़ाई-लिखाई और करियर के नाम पर घरों से दूर शहरों, कॉलेजों और हॉस्टलों में रहते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए सब कुछ लगा देते हैं, लेकिन इसी बीच कुछ युवा गलत संगत और गलत फैसलों की चपेट में आ जाते हैं। समाजशास्त्रियों का कहना है कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का संतुलन बिगड़ते ही जोखिम शुरू हो जाता है।

▪ नई दोस्तियाँ
▪ सोशल मीडिया की अंधी दुनिया
▪ त्वरित भरोसा
▪ बिना सोचे-समझे पैसे खर्च करना

यह सब युवाओं के जीवन को खतरे की ओर धकेल देते हैं।अक्सर देखने में आता है कि माता-पिता बच्चों की जरूरतें पूरी करने में जुटे रहते हैं, लेकिन उनके मानसिक बदलाव, नई संगत और दैनिक गतिविधियों पर ध्यान ही नहीं दे पाते।

कई बार बच्चे खुद भी यह समझ नहीं पाते कि कौन सही है और कौन गलत।

बाहर की चमक-दमक और मीठी बातें,बहुत जल्दी भरोसा दिला देती हैं। यही भरोसा कई बार अपराधियों के हाथों एक औजार बन जाता है।और जब तक सच सामने आता है, बहुत देर हो चुकी होती है।

इस केस ने भी माता-पिता को यह चेतावनी दी है

डिग्री से ज्यादा जरूरी है सही दिशा। सफलता से ज्यादा जरूरी है सुरक्षा। समाज को यह समझना होगा कि,युवाओं को रोकना नहीं,जागरूक करना है।उन्हें दोस्त चुनने से लेकर,पैसा कहाँ खर्च हो रहा है, किनसे संपर्क है इन सब पर आत्मनियंत्रण और समझ विकसित करनी होगी। क्योंकि एक गलत फैसला,करियर, प्रतिष्ठा और जीवन सब कुछ दांव पर लगा सकता है।

 

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