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जब प्रेम ने भक्ति को गले लगाया प्रेमानंद महाराज ने गुरु शरणानंद को अपनी गद्दी पर बिठाया।

मथुरा में दो संतों का दिव्य संगम जहां आस्था ने अहंकार को हराया।

हाईलाइट

प्रेमानंद महाराज ने दी नई परिभाषा — गद्दी प्रभु की, संत उसका सेवक।
धर्म का असली रूप देखा मथुरा ने — जहां प्रेम ही पूजा बना।
युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा — प्रेमानंद महाराज ने दिखाया सच्चे धर्म का मार्ग।
 गद्दी पर नहीं, विनम्रता पर बैठा धर्म — प्रेमानंद महाराज का प्रेम विलक्षण बन गया।

मथुरा की पावन भूमि पर वह पल किसी चमत्कार से कम नहीं था। केली कुंज आश्रम में जब प्रेमानंद महाराज ने अपने जीवन में पहली बार अपनी गद्दी किसी अन्य संत गुरु शरणानंद महाराज को समर्पित कर दी, तो वहां उपस्थित हर भक्त की आंखें नम हो उठीं। वह दृश्य केवल एक परंपरा का नहीं, बल्कि उस अदृश्य आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक था जो प्रेम, विनम्रता और भक्ति से ही संभव है।

प्रेमानंद महाराज, जिन्होंने अपने तप, त्याग और भक्ति से न केवल मथुरा, बल्कि पूरे भारत में भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का परचम फहराया, उन्होंने उस दिन यह संदेश दिया कि सच्चा गुरु वही है जो खुद झुककर दूसरों को ऊपर उठाए। जब उन्होंने अपने चरणों में बैठने आए गुरु शरणानंद महाराज को उठाकर अपनी गद्दी पर बिठाया, तो यह केवल सम्मान नहीं था — यह सनातन धर्म की उस मर्यादा की पुनर्स्थापना थी जिसमें “अहम्” नहीं, केवल “शरण” होती है।

आश्रय में बैठे भक्तों ने देखा कि जैसे ही दोनों संतों ने एक-दूसरे को आलिंगन दिया, वहां का वातावरण आलोकित हो उठा। हवा में मंत्रों की ध्वनि, पुष्पों की वर्षा और भक्तों की आंखों से बहे आंसू — सब गवाही दे रहे थे कि यह दृश्य किसी कथा से कम नहीं। ऐसा लगा जैसे भगवान श्रीकृष्ण स्वयं वहां विराजमान हों और कह रहे हों “देखो, यह है सच्ची भक्ति, जहां आत्मा का मिलन आत्मा से होता है।”

भटके हुए युग के लिए एक चेतावनी और संदेश है आज का समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी, भक्ति से दूर होकर भोग और भ्रम की राह पर बढ़ चली है। मोबाइल की स्क्रीन पर दिखने वाला जगमगाता संसार असली सुख नहीं, बल्कि एक भ्रम है। जहां कभी बच्चे भजन गाते थे, अब वहीं कानों में ईयरफोन लगाए दुनियावी गीत गूंजते हैं। जहां कभी माता-बहनें तुलसी के आगे दीप जलाती थीं, अब वहां सेल्फी की रोशनी है।

ऐसे समय में प्रेमानंद महाराज जैसे संतों का जीवन एक दीपक बनकर इस अंधकार में रोशनी देता है। उनका सादा जीवन, निर्मल हृदय और भगवान के प्रति अखंड आस्था यह सिखाती है कि भक्ति केवल वाणी में नहीं, बल्कि विनम्रता और सेवा में बसती है। महाराज ने सदा कहा भगवान को पाने के लिए किसी विशेष स्थान की नहीं, साफ़ मन की ज़रूरत होती है।”

उनकी यही शिक्षा आज हर माता-पिता को अपने बच्चों को देनी चाहिए। क्योंकि धर्म का मतलब केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन के हर कार्य में भगवान को देखना है। जो बच्चा अपने माता-पिता की सेवा करता है, वह खुद भगवान की पूजा करता है। जो युवती अपने घर में तुलसी को पानी देती है, वह लक्ष्मी के चरण धोती है। जो युवा अपने कर्म में सच्चा है, वही असली भक्त है। भक्ति का अर्थ केवल मंदिर नहीं, मन का आंगन भी है गुरु शरणानंद महाराज और प्रेमानंद जी का यह मिलन हमें यह भी सिखाता है कि संत परंपरा केवल चोले की नहीं, बल्कि चरित्र की परंपरा है। आज के समय में जब लोग धर्म को दिखावे का साधन बना चुके हैं, तब यह दोनों संत सच्चे धर्म की जीवंत परिभाषा हैं।

उनका आलिंगन केवल शरीर का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का संगम था। एक ओर प्रेमानंद जी का प्रेम, दूसरी ओर गुरु शरणानंद जी की विनम्रता इन दोनों का संगम देखकर भक्तों की आंखें बरस पड़ीं। वह क्षण जब प्रेमानंद जी ने गद्दी खाली कर कहा, गद्दी मेरी नहीं, प्रभु की है; इसे संभालने वाला कोई भी संत, उसी प्रभु की कृपा से धन्य है।”वह शब्द सीधे हर भक्त के हृदय में उतर गए।

प्रेमानंद महाराज की जीवनगाथा युवाओं को यह सिखाती है कि असली क्रांति हथियारों से नहीं, संस्कारों से होती है। आज की पीढ़ी जो चमकती दुनिया की ओर दौड़ रही है, उसे यह समझना होगा कि असली चमक मन की शांति और आस्था में है। धर्म केवल प्रवचन नहीं, बल्कि अपने जीवन में सद्गुणों का अभ्यास है सत्य बोलना, माता-पिता का आदर करना, बड़ों के चरण स्पर्श करना, और सबसे बड़ा धर्म किसी का दिल न दुखाना।

प्रेमानंद महाराज की मुस्कान में जो शांति है, वह किसी दौलत से नहीं खरीदी जा सकती। उनकी आंखों से जो प्रेम झलकता है, वह हमें याद दिलाता है कि भगवान दूर नहीं, हमारे ही भीतर हैं। माता बहनें समाज की रीढ़ हैं। यदि वे घर में भक्ति की ज्योति जलाए रखेंगी, तो पूरा परिवार प्रकाशमय रहेगा।

प्रेमानंद जी सदा कहते हैं घर में मां की आस्था ही मंदिर की आरती है।” जब कोई मां अपने बच्चे को भगवान का नाम सिखाती है, तब वह अपने घर में स्वर्ग बना देती है। आज की स्त्रियों के लिए यह अवसर है कि वे आधुनिकता के साथ-साथ संस्कार और श्रद्धा को भी जिंदा रखें।

अंत में धर्म की पुनर्जागरण का आरंभ प्रेमानंद महाराज और गुरु शरणानंद महाराज का यह मिलन केवल दो संतों की भेंट नहीं थी यह एक संदेश था मानवता के लिए, एक आवाज़ थी उस खोई हुई भक्ति के लिए। उनका आलिंगन हमें याद दिलाता है कि प्रेम, करुणा और श्रद्धा से बढ़कर इस संसार में कुछ नहीं।

आज जब धर्म को राजनीति और दिखावे में बांट दिया गया है, तब ऐसे संत हमें बताते हैं “धर्म बांटता नहीं, जोड़ता है।” और प्रेमानंद महाराज ने जो किया, वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा क्योंकि उन्होंने अपने कर्म से दिखा दिया कि संत वही है जो स्वयं झुककर दूसरों को ऊपर उठाए। भक्ति किसी एक परंपरा या संप्रदाय की नहीं, भक्ति वह प्रकाश है जो हर हृदय में जल सकता है, यदि उसमें प्रेम, नम्रता और सत्य की भावना जीवित है।

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