अंतरराष्ट्रीय

कज़ाख़स्तान इज़राइल के अब्राहम समझौते में शामिल हो गया है।

साल 2025 की एक अहम कूटनीतिक घटना के रूप में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह घोषणा की कि कज़ाख़स्तान इज़राइल के साथ अब्राहम समझौते में शामिल होने जा रहा है। इस घोषणा ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी, क्योंकि अब्राहम समझौते को पश्चिम एशिया के क्षेत्रीय स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया कि उन्होंने इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और कज़ाख़स्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव से विस्तृत बातचीत की है। इस वार्ता में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग को औपचारिक रूप देने पर सहमति बनी। ट्रंप ने यह भी कहा कि समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख जल्द घोषित की जाएगी और कई अन्य मुस्लिम देश इस पहल में रुचि दिखा रहे हैं।

अब्राहम समझौता पहली बार 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में सामने आया था। तब संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इज़राइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। इसी वर्ष बाद में मोरक्को ने भी इस समझौते में शामिल होकर मध्य पूर्व की राजनीतिक परंपराओं को एक नया आयाम दिया। इस पहल का उद्देश्य दशकों से चले आ रहे अरब-इज़राइल मतभेद को संवाद और सहयोग के माध्यम से शांतिपूर्ण रूप से सुलझाना था।

ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते को धार्मिक और भू-राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर स्थायी शांति का प्रयास बताया। राष्ट्रपति ट्रंप का मानना था कि इज़राइल और मुस्लिम देशों के बीच सामान्य संबंध न केवल क्षेत्र में स्थिरता लाएंगे बल्कि आर्थिक और वैज्ञानिक सहयोग को भी गति देंगे। यही कारण है कि अपने वर्तमान कार्यकाल में उन्होंने इस समझौते के दायरे को और व्यापक करने का संकल्प लिया।

कज़ाख़स्तान का इस समझौते में शामिल होना मध्य एशियाई देशों की नई कूटनीतिक दिशा को भी दर्शाता है। कज़ाख़स्तान लंबे समय से क्षेत्र में शांतिपूर्ण और व्यावहारिक विदेश नीति का पालन करता आया है। उसने रूस, चीन और पश्चिम के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। अब इज़राइल के साथ औपचारिक साझेदारी उस संतुलन को नए आयाम पर ले जाती है।

व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप की बैठक में कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, और उज्बेकिस्तान के नेता मौजूद थे। बैठक में सेंट्रल एशिया की कूटनीतिक संभावनाओं और अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति पर चर्चा हुई। ट्रंप ने कहा कि इन देशों में से कुछ निकट भविष्य में अब्राहम समझौते से जुड़ सकते हैं। इस पहल का एक बड़ा उद्देश्य अमेरिका की भूमिका को क्षेत्र में पुनः मजबूत करना भी है, विशेषतः ऐसे समय में जब चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और रूस का सुरक्षा प्रभाव दोनों ही क्षेत्र में गहराई से उपस्थित हैं।

कज़ाख़स्तान की सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया कि अब्राहम समझौते में शामिल होना उसकी विदेश नीति का स्वाभाविक विस्तार है। उन्होंने कहा कि कज़ाख़स्तान हमेशा बातचीत, आपसी सम्मान और स्थायित्व पर आधारित नीति का समर्थन करता है। इज़राइल के साथ पहले से ही दोनों देशों के मजबूत राजनयिक और आर्थिक संबंध हैं। कज़ाख़स्तान इज़राइल को उच्च प्रौद्योगिकी, कृषि, जल संसाधन प्रबंधन और सुरक्षा मामलों में एक सक्षम साझेदार मानता है। इसलिए यह कदम केवल औपचारिकता नहीं बल्कि साझेदारी का तार्किक विस्तार है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस पहल की प्रशंसा करते हुए कहा कि अब्राहम समझौते में कज़ाख़स्तान की भागीदारी आर्थिक, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को नई दिशा देगी। उन्होंने कहा कि यह समझौता केवल शांति की अवधारणा नहीं बल्कि ठोस आर्थिक अवसरों का माध्यम है। अमेरिका चाहता है कि यह समझौता मध्य एशिया और मध्य पूर्व दोनों ही क्षेत्रों में आपसी निवेश और नवाचार के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि यह कदम समझौते में नई गति लाएगा। पिछले कुछ महीनों में गाजा युद्ध और बढ़ते तनाव के कारण अब्राहम समझौते की चर्चा धीमी पड़ गई थी। कई अरब देशों ने इज़राइल के साथ संबंधों की समीक्षा शुरू कर दी थी। परंतु कज़ाख़स्तान का इस दिशा में आगे आना यह दर्शाता है कि मुस्लिम देशों में अब भी एक अच्छी संख्या ऐसे देशों की है जो शांतिपूर्ण समाधान और व्यावहारिक सहयोग में विश्वास रखते हैं।

राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि कज़ाख़स्तान का यह निर्णय कई दृष्टियों से ऐतिहासिक है। सबसे पहले, यह पहली बार है जब किसी मध्य एशियाई देश ने अब्राहम समझौते के दायरे में आने का निर्णय लिया है। इससे यह संदेश गया है कि यह समझौता केवल अरब दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव अब इस्लामी दुनिया के और व्यापक हिस्सों में फैल रहा है। दूसरे, इस निर्णय से कज़ाख़स्तान की विदेश नीति और अधिक वैश्विक व रणनीतिक हो गई है।

कज़ाख़स्तान के दृष्टिकोण से यह कदम व्यावहारिक भी है। इज़राइल उसके लिए तकनीकी साझेदारी का एक बड़ा स्रोत है। कृषि क्षेत्र में जलवायु अनुकूलन और जल प्रबंधन तकनीक में इज़राइल अग्रणी है, जिससे मध्य एशिया को लाभ हो सकता है। वहीं ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग पर भी दोनों देश समान दृष्टिकोण रखते हैं।

इसी क्रम में अमेरिका की रुचि भी समझ में आती है। सेंट्रल एशिया में अमेरिका का प्रभाव रूस और चीन की तुलना में कमजोर रहा है। ऐसे में, अब्राहम समझौते के विस्तार के माध्यम से अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और भूमिका को पुनर्जीवित करने की रणनीति अपना रहा है। ट्रंप ने यह भी इशारा किया कि आने वाले समय में उज्बेकिस्तान या ताजिकिस्तान भी इस पहल में रुचि दिखा सकते हैं।

इज़राइल के नेताओं ने कज़ाख़स्तान के निर्णय का स्वागत किया। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने बयान जारी कर कहा कि इस समझौते से इज़राइल और मुस्लिम दुनिया के बीच संवाद का एक नया पुल बनेगा। उन्होंने कहा कि अब्राहम समझौते ने यह प्रमाणित कर दिया है कि सहयोग और आपसी सम्मान के माध्यम से ऐतिहासिक मतभेदों को पीछे छोड़ा जा सकता है।

दूसरी ओर, फिलिस्तीनी नेताओं और उनके समर्थकों ने इस कदम की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इज़राइल से संबंध सामान्य करना तब तक उचित नहीं है जब तक फिलिस्तीन को उसका अधिकार नहीं मिल जाता। उनका कहना है कि इज़राइल के साथ ऐसे समझौते फिलिस्तीनी संघर्ष को कमजोर करते हैं और उनकी स्थिति को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नुकसान पहुँचाते हैं। कुछ अरब राष्ट्र भी इस दृष्टिकोण से सहमत हैं, लेकिन वे खुलकर आपत्ति नहीं जता रहे।

हालाँकि, कई अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि अब्राहम समझौते की वास्तविक सफलता इस बात में निहित होगी कि इसमें शामिल देश कितनी पारदर्शिता और व्यावहारिकता से सहयोग को लागू करते हैं। केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ठोस परियोजनाओं और संयुक्त निवेश से ही इसका प्रभाव स्थायी बनेगा।

समग्र रूप में, कज़ाख़स्तान का अब्राहम समझौते में शामिल होना एक बड़ी कूटनीतिक घटना है। यह अमेरिका की मध्य एशिया नीति, इज़राइल की व्यापक कूटनीतिक रणनीति और मुस्लिम देशों की बदलती सोच – तीनों को एक साथ जोड़ता है। इस कदम से यह प्रतीत होता है कि आने वाले वर्षों में एशिया और मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक समीकरण में नई धाराएँ उभरेंगी।

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