प्रशासनिक समाचार

अजमेर दरगाह के तीन हजार खादिम केंद्र सरकार के निर्देशों के खिलाफ खड़े हो गए हैं।

केंद्र सरकार बनाम अजमेर दरगाह के खादिम: टकराव की नई कहानी

1. मुद्दे की पृष्ठभूमि: क्यों उठा विवाद

राजस्थान के अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सूफी परंपरा और आपसी भाईचारे का बड़ा केंद्र मानी जाती है। हर दिन लाखों लोग यहां श्रद्धा के साथ जियारत के लिए पहुंचते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से दरगाह में आने वाले जायरीनों के साथ दुर्व्यवहार, जबरन वसूली और अव्यवस्था की शिकायतें लगातार सामने आ रही थीं। इन्हीं शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने दरगाह से जुड़े खादिमों के लिए लाइसेंस व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया।

इस फैसले का उद्देश्य दरगाह परिसर में अनुशासन लाना, जायरीनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाना बताया गया। लेकिन यह निर्णय अब सरकार और खादिमों के बीच टकराव का बड़ा कारण बन गया है।


2. लाइसेंस व्यवस्था क्या है और सरकार का तर्क

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा नियुक्त दरगाह कमेटी के नाजिम ने सभी खादिमों के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया। इसके लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू की गई और अंतिम तिथि 5 जनवरी तय की गई। मंत्रालय का कहना है कि लाइसेंस मिलने के बाद ही कोई खादिम जायरीनों के संपर्क में आ सकेगा।

सरकार के अनुसार, इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आपराधिक प्रवृत्ति वाले या नियमों का उल्लंघन करने वाले लोग दरगाह परिसर में सक्रिय न रहें। साथ ही, इससे जायरीनों को एक सुरक्षित और सम्मानजनक धार्मिक अनुभव मिलेगा। प्रशासन का दावा है कि यह कदम दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम, 1955 के तहत पूरी तरह वैध है।


3. खादिमों का विरोध: ‘तुगलकी फरमान’ का आरोप

दूसरी ओर, अजमेर दरगाह से जुड़े लगभग तीन हजार खादिम इस लाइसेंस व्यवस्था को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। खादिमों की प्रमुख संस्थाएं—अंजुमन सैयद जागदान और अंजुमन शेख जादगान—ने एक स्वर में इस फैसले का विरोध किया है।

अंजुमन सैयद जागदान के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने इसे “तुगलकी फरमान” करार देते हुए कहा कि यह परंपरागत अधिकारों पर सीधा हमला है। उनका कहना है कि खादिम पीढ़ियों से दरगाह की सेवा करते आ रहे हैं और उन्हें किसी सरकारी लाइसेंस की जरूरत नहीं होनी चाहिए। यही कारण है कि आवेदन की अंतिम तिथि गुजर जाने के बावजूद एक भी खादिम ने लाइसेंस के लिए आवेदन नहीं किया।


4. कानूनी पहलू: क्या कहता है दरगाह अधिनियम

इस विवाद में कानूनी पक्ष भी अहम है। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डीआईजी बिलाल खान सहित कई जानकारों का कहना है कि दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम, 1955 की धारा 11(एफ) के तहत दरगाह प्रशासन को ऐसी व्यवस्था लागू करने का अधिकार है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, लाइसेंस प्रणाली किसी भी खादिम के धार्मिक अधिकारों को खत्म नहीं करती, बल्कि केवल प्रशासनिक निगरानी का एक माध्यम है। उनका मानना है कि यदि कोई खादिम ईमानदारी से सेवा कर रहा है, तो उसे लाइसेंस लेने से कोई नुकसान नहीं होगा।


5. जायरीनों की बढ़ती संख्या और अव्यवस्था की समस्या

अजमेर जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, दरगाह में रोजाना औसतन एक लाख जायरीन पहुंचते हैं। उर्स जैसे विशेष अवसरों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। हाल ही में 17 से 27 दिसंबर तक चले उर्स के दौरान करीब 14 लाख से अधिक जायरीन दरगाह पहुंचे।

इतनी बड़ी भीड़ के कारण अव्यवस्था की स्थिति बनना आम बात है। कई बार जायरीनों से जबरन चढ़ावे की मांग, मारपीट और अभद्र व्यवहार की शिकायतें सामने आई हैं। प्रशासन का कहना है कि लाइसेंस व्यवस्था लागू होने से ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।


6. खादिमों की दलील: आर्थिक और प्रशासनिक सवाल

खादिमों का तर्क है कि अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय दरगाह के संचालन में कोई आर्थिक योगदान नहीं देता। उनका कहना है कि दरगाह से जुड़े कर्मचारी और व्यवस्थाएं दरगाह की आय से ही चलती हैं। ऐसे में मंत्रालय द्वारा नियम थोपना अनुचित है।

खादिम यह भी आशंका जता रहे हैं कि लाइसेंस व्यवस्था के जरिए भविष्य में उनकी संख्या सीमित की जा सकती है या परंपरागत सेवा व्यवस्था को कमजोर किया जा सकता है। इसी डर के चलते वे सरकार के इस फैसले को अपने अधिकारों के खिलाफ मान रहे हैं।


7. समाधान की राह: टकराव या संवाद

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल नियमों का नहीं, बल्कि विश्वास और संवाद की कमी का भी है। यदि सरकार और खादिम संगठन आपसी बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकालें, तो स्थिति सुधर सकती है।

संभावना है कि सरकार लाइसेंस प्रक्रिया में कुछ लचीलापन दिखाए और खादिमों की पारंपरिक भूमिका को सम्मान देते हुए नियमों को लागू करे। वहीं, खादिमों को भी जायरीनों की सुरक्षा और सम्मान को सर्वोपरि रखते हुए सुधार के लिए तैयार होना होगा।


निष्कर्ष

अजमेर दरगाह का यह विवाद सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परंपरा, आस्था और आधुनिक प्रबंधन के टकराव का उदाहरण बन गया है। एक ओर सरकार अनुशासन और पारदर्शिता की बात कर रही है, तो दूसरी ओर खादिम अपने ऐतिहासिक अधिकारों की रक्षा के लिए खड़े हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह टकराव अदालत तक जाता है या संवाद के जरिए कोई संतुलित समाधान निकलता है।

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