‘अगर राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति कार्य कर सकते हैं, तो… जस्टिस यशवंत वर्मा केस में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के महाभियोग मामले में सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने पूछा कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्य कर सकते हैं, तो राज्यसभा के उपसभापति सभापति के कार्य क्यों नहीं कर सकते। जस्टिस वर्मा ने जांच समिति को चुनौती दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जवाब देने की तारीख बढ़ाने से इनकार कर दिया और फैसला सुरक्षित रख लिया।
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा।
- उपसभापति के महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के अधिकार पर टिप्पणी।
- जांच समिति को जवाब देने की तारीख बढ़ाने से इनकार किया।
कदाचार के आरोपों में महाभियोग कार्यवाही का सामना कर रहे इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा की जांच समिति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उनके कार्य कर सकते हैं, तो राज्यसभा के उपसभापति सभापति के कार्य क्यों नहीं कर सकते।
कोर्ट ने ये टिप्पणी तब की जब जस्टिस यशवंत वर्मा के वकील दलील दे रहे थे कि राज्यसभा के उपसभापति के पास प्रस्ताव अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है, जजेस इन्क्वायरी एक्ट 1968 के तहत सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को ही किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और एससी एससी शर्मा की पीठ ने गुरुवार को जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर बहस सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
इसके अलावा जस्टिस यशवंत वर्मा को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से झटका भी लगा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जांच समिति के समक्ष जवाब देने के लिए तय 12 जनवरी की तारीख बढ़ाने का उनकी ओर से किया गया अनुरोध गुरुवार को नहीं माना।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा जब दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे तब गत 14 मार्च की रात उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर आग लग गई थी और आग बुझाने पहुंचे अग्निशमनदल को आवास के एक स्टोर रूम में भारी मात्रा में जले हुए नोटों की गड्डियां मिली थीं।
इस मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ कदाचार में पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग की कार्यवाही लंबित है। लोकसभा सांसदों के महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार करते हुए जांच कमेटी गठित की है।
जिसके समक्ष जस्टिस यशवंत वर्मा को 12 जनवरी तक जवाब देना है। यशवंत वर्मा ने गुमनाम याचिका दाखिल कर जांच कमेटी गठन को और महाभियोग कार्यवाही को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
गुरुवार को यशवंत वर्मा की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने बहस की। रोहतगी और लूथरा की दलीलें थीं कि राज्यसभा के उपसभापति को राज्यसभा के सांसदों द्वारा दिया गया प्रस्ताव खारिज करने का अधिकार नहीं है।
उनका कहना था कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 91 के प्रविधान लागू नहीं होंगे जो राज्यसभा के उपसभापति को सभापति की अनुपस्थिति में उनके कर्तव्यों का निर्वाहन करने की अनुमति देता है।
उनका कहना था कि जजेस इन्क्वायरी एक्ट में जो अधिकार सभापति को दिए गए हैं उपसभापति उनका इस्तेमाल नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि जबतक नये सभापति नियुक्त होते तबतक मामले में इंतजार किया जाना चाहिए था।
ज्ञातव्य हो कि उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने पद से इस्तीफा दे दिया था उनके इस्तीफा देने के बाद उपसभापति हरवंश ने राज्यसभा सांसदों द्वारा जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग कार्यवाही शुरू करने का दिया गया प्रस्ताव खारिज कर दिया था।
हालांकि लोकसभा सदस्यों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष को दिया गया प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया था और एक जांच कमेटी भी गठित कर दी है जिसने यशवंत वर्मा से 12 जनवरी तक जवाब मांगा है।
हालांकि कमेटी वर्मा को जवाब देने के लिए एक बार समय विस्तार दे चुकी है। गुरुवार को यशवंत वर्मा के वकील ने जवाब के लिए तय 12 जनवरी की तारीख बढ़ाने का कोर्ट से अनुरोध किया लेकिन कोर्ट ने तारीख नहीं बढ़ाई और कहा कि आप जवाब दाखिल कररिये।
उपसभापति के महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के अधिकार पर टिप्पणी
जब यशवंत वर्मा के वकील उपसभापति के प्रस्ताव खारिज करने के खिलाफ दलीलें दे रहे थे तब पीठ ने उनकी दलीलों से असहमति जताते हुए कहा कि संविधान शून्यता में नहीं रह सकता।
अगर उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति के कार्य कर सकते हैं तो क्या राज्यसभा के उपसभापति सभापति की अनुपस्थिति में सभापति के कार्य क्यों नहीं कर सकते।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने ये भी कहा कि अगर राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति की हैसियत से जजों की नियुक्ति वारंट पर हस्ताक्षर कर सकते हैं तो फिर उपसभापति, सभापति की अनुपस्थिति में महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार क्यों नहीं कर सकते।
जांच समिति को जवाब देने की तारीख बढ़ाने से इनकार किया
जस्टिस दत्ता ने कहा कि देश चलते रहना चाहिए। शून्यता नही हो सकती। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सचिवालयों की ओर से पेश सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसी किसी भी व्याख्या से बचना चाहिए जो उद्देश्य को विफल कर दे या किसी प्रविधान को अव्यवहारिक बना दे। उन्होंने कहा कि अगर उपसभापति, सभापति की शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकते तो प्रविधान अव्यवहारिक हो जाएगा।
जांच समिति को तीन महीने के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है और उसके बाद उसका कार्य समाप्त हो जाता है। यदि सभापति ही न हों तो जांच समिति को समय विस्तार कौन देगा। जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका में कहा गया है कि जब दोनों सदनों में प्रस्ताव पेश हुआ था तो निमय के मुताबिक संयुक्त जांच समिति होनी चाहिए थी।



