
शाम ढल रही थी, चुनावी नारों की गूँज अब थक चुकी थी। तभी अचानक एक चिट्ठी आई — स्याही में सच्चाई थी, शब्दों में विद्रोह।
यह चिट्ठी थी रामाधार सिंह की — जो वर्षों से बीजेपी की निष्ठा का प्रतीक रहे। पर अब वही लिख रहे थे, “मैं अपराधियों के अधीन नहीं झुक सकता।”
उनके शब्द चिंगारी की तरह फैले —
“मैंने जूते तोड़कर राजनीति सीखी है, किसी के चरण चूमकर नहीं।”
इन पंक्तियों में एक पुराने कार्यकर्ता की पीड़ा थी, और उस आदमी का साहस जिसने भीड़ में भी सच्चाई की आवाज़ उठाई।
राजनीति की रंगमंच पर यह चिट्ठी मानो आत्मा की पुकार बन गई।
जब आत्मसम्मान बनाम संगठन की लड़ाई सामने आई
पूर्व मंत्री रामाधार सिंह का बीजेपी से त्यागपत्र एक व्यक्ति की बगावत नहीं, बल्कि संगठन और सिद्धांत के बीच की खाई का प्रतीक है।
बीजेपी ने जिस कार्यकर्ता संस्कृति पर अपनी पहचान बनाई थी, आज वही संस्कृति जातीय समीकरणों और बाहुबलियों की राजनीति में गुम होती दिख रही है।
रामाधार सिंह का पत्र इस सच्चाई को उजागर करता है कि पार्टी में अब विचार नहीं, बल्कि “विजय” प्राथमिकता बन गई है।
अगर नेतृत्व आत्ममंथन नहीं करता, तो ऐसे त्यागपत्र आने वाले समय में “राजनीतिक विद्रोहों की श्रृंखला” में बदल सकते हैं।
कभी “सेवा, संगठन और संस्कार” का नारा देने वाली पार्टी के लिए यह स्थिति आत्मचिंतन की घड़ी है।



