राष्ट्रपति से गुहार: अधिवक्ता राकेश किशोर का निलंबन रद्द हो , न्याय की गरिमा और धार्मिक भावनाओं के सम्मान की उठी मांग।
जजों को भी धार्मिक आस्थाओं का आदर करना चाहिए, बिना सुनवाई के सज़ा न्याय नहीं, अन्याय है!

हाईलाइट
जब अदालत में आस्था आहत हो जाए, तो न्याय भी सवालों के कटघरे में खड़ा नज़र आता है…”
धर्म की बेइज़्ज़ती और बिना सुनवाई का फ़ैसला — क्या यही न्याय का नया तराज़ू है?”
कानून की किताबों में लिखा है न्याय, पर भावनाओं की आवाज़ कौन सुने?”
जूता नहीं था विरोध, वो एक आहत दिल की पुकार थी — जिसे बार काउंसिल ने सज़ा दे दी…”
न्याय के मंदिर में जब धर्म पर चोट लगे, तो श्रद्धा कैसे ज़िंदा रहे?”
अगर जजों के शब्दों से आस्था टूटे, तो फैसलों पर भरोसा कौन रखे?”
नई दिल्ली, 7 अक्टूबर देश की राजधानी से एक ऐसी आवाज़ उठी है जो न केवल न्यायपालिका की निष्पक्षता बल्कि धार्मिक आस्थाओं के सम्मान पर भी सवाल खड़ा करती है। अधिवक्ता राकेश किशोर के निलंबन के खिलाफ एक नागरिक मिथु सिंह ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया की कार्रवाई को असंवैधानिक, एकतरफा, और अन्यायपूर्ण बताया है।मिथु सिंह ने कहा है कि “न्याय केवल सज़ा देने का नाम नहीं, बल्कि न्यायिक मर्यादा और संवेदनशीलता का प्रतीक है। अगर एक अधिवक्ता ने धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा पर आहत होकर विरोध जताया, तो उसे अपराध नहीं समझना चाहिए, बल्कि न्यायपालिका को आत्ममंथन करना चाहिए।
🔹 घटना का संक्षिप्त विवरण 6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की पीठ पर अधिवक्ता राकेश किशोर ने विरोध स्वरूप जूता फेंकने की घटना की। बताया जा रहा है कि सुनवाई के दौरान की गई धार्मिक टिप्पणी से वे आहत हुए थे और भावनाओं में बहकर उन्होंने यह कदम उठाया। घटना के तुरंत बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने बिना किसी जांच, नोटिस या सुनवाई के उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया। इस फैसले को “एकतरफा न्याय” करार देते हुए न्याय के सिद्धांतों का हनन बताया जा रहा है।
🔹 पत्र की प्रमुख बातें मिथु सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि यह निलंबन अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 और 36 के अनुसार किसी भी अधिवक्ता को सज़ा देने से पहले सुनवाई, जांच और अवसर देना अनिवार्य है। बिना सुनवाई के निलंबन आदेश जारी करना अवैध और असंवैधानिक है। उन्होंने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश देकर इस आदेश को तुरंत रद्द कराया जाए और निष्पक्ष जांच समिति गठित की जाए।
🔹 धार्मिक भावनाओं के सम्मान की मांग पत्र में कहा गया है: न्यायपालिका संविधान का प्रहरी है, लेकिन उसे भी समाज की धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं का सम्मान करना चाहिए। कोई भी टिप्पणी, जो किसी धर्म, देवी-देवता या विश्वास को ठेस पहुंचाए, न्याय की गरिमा के विपरीत है।” मिथु सिंह ने लिखा कि न्यायालय का दायित्व केवल कानून की व्याख्या करना नहीं है, बल्कि न्याय की भावना के अनुरूप समाज की आस्थाओं का आदर करना भी है। जब कोई न्यायमूर्ति ऐसी टिप्पणी करते हैं जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती है, तो समाज का विश्वास कमजोर होता है।”
🔹 जजों के लिए आत्मसंयम और मर्यादा का संदेश पत्र में जजों से यह भी अपील की गई है कि वे अपने निर्णयों और टिप्पणियों में धार्मिक संवेदनशीलता बरतें किसी भी धर्म, परंपरा या देवी-देवता पर कटाक्ष करने से बचें न्याय की मर्यादा और समाज की भावना के बीच संतुलन बनाए रखें धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं कि धर्म का अपमान किया जाए। बल्कि इसका अर्थ है — सबका समान सम्मान।”
🔹 जनता की आवाज़: ‘भावनाओं की उपेक्षा अन्याय है’ देशभर के नागरिकों और अधिवक्ता समुदाय में यह चर्चा तेज़ है कि जब जनता के प्रतिनिधि, जज, और न्याय के संरक्षक ही भावनाओं का अपमान करेंगे, तो जनता न्याय की उम्मीद किससे रखे?” कई कानूनी विशेषज्ञों ने भी कहा है कि भावनाओं में आकर अधिवक्ता का कदम अनुचित था, लेकिन सज़ा भी नियमों के तहत ही दी जानी चाहिए थी।बिना सुनवाई किसी को दंडित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हनन है।”
🔹 संविधान की भावना पर चोट अनुच्छेद 21: हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। एडवोकेट्स एक्ट 1961: अधिवक्ता पर अनुशासनात्मक कार्रवाई से पहले सुनवाई और जांच अनिवार्य। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत Audi Alteram Partem” — दोनों पक्षों को सुना जाए। “Nemo Judex in Causa Sua” — कोई व्यक्ति स्वयं का न्यायाधीश न बने।
🔹 राष्ट्रपति से मांगी गई राहत निलंबन आदेश तुरंत निरस्त किया जाए। पूर्ण जांच समिति गठित हो। अधिवक्ता को सुनवाई का अवसर दिया जाए। जजों को धार्मिक टिप्पणियों से बचने के लिए मार्गदर्शन जारी हो।

🔹 न्यायपालिका की गरिमा बनाम जनता की आस्था यह मामला सिर्फ एक अधिवक्ता का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता और जनता की भावनाओं का है। अगर न्याय के मंदिर में ही धार्मिक आस्थाओं का अपमान होगा, तो समाज में असंतोष और अविश्वास बढ़ेगा। न्याय तभी सार्थक है जब वह न केवल विधि के अनुरूप, बल्कि भावनाओं के प्रति संवेदनशील भी हो।
🔹 समाज की उम्मीदें राष्ट्रपति से अब सबकी निगाहें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पर हैं, जो संवैधानिक मूल्यों की संरक्षिका हैं। देश को उम्मीद है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप कर न्याय,संवेदनशीलता,और धार्मिक मर्यादा तीनों की रक्षा करेंगी। “न्याय बिना संवेदना अधूरा है, और आस्था के बिना समाज अंधकारमय।”अधिवक्ता राकेश किशोर के मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज भी न्यायालय जनता की भावनाओं को सुनने को तैयार हैं?या फिर कानून की किताबों में छिपी संवेदनशीलता कहीं खो गई है? देश अब राष्ट्रपति की ओर देख रहा है क्या न्याय की यह पुकार सुनी जाएगी?




