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चीन के कर्ज के जाल में पूरी तरह धंसा बांग्लादेश, ढाका की हालत श्रीलंका से बदतर; पाकिस्तान से भी नाजुक स्थिति

बांग्लादेश चीन के कर्ज के जाल में बुरी तरह फँस गया है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति गंभीर हो गई है। अधिकारियों के अनुसार, देश कर्ज के दलदल में उतर चुका है, जहाँ कर्ज चुकाने का खर्च खेती और शिक्षा से भी अधिक है। यह स्थिति श्रीलंका और पाकिस्तान जैसी है। 2016 में बेल्ट एंड रोड योजना से जुड़ने के बाद बांग्लादेश पर चीनी कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ा है, जिससे विदेशी कर्ज 105 अरब डॉलर तक पहुँच गया है।

बांग्लादेश अब केवल आर्थिक दबाव में नहीं, बल्कि चीन के कर्ज के जाल में बुरी तरह फंसा हुआ देश बन चुका है। हालात इतने गंभीर हैं कि खुद बांग्लादेश के शीर्ष अधिकारी मान रहे हैं कि देश कर्ज के दलदल में उतर चुका है।

स्थिति यह है कि कर्ज चुकाने का खर्च खेती और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों से भी ज्यादा हो गया है, जिससे नीतिगत फैसलों की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है। अधिकारियों के मुताबिक ढाका अब उसी रास्ते पर बढ़ रहा है, जिस पर चलकर श्रीलंका तबाह हुआ और पाकिस्तान आज तक संभल नहीं पाया।

कर्ज के दलदल में डतर चुका है बांग्लादेश

बांग्लादेश के राष्ट्रीय राजस्व बोर्ड के चेयरमैन एम अब्दुर रहमान खान ने कहा है कि देश पहले ही कर्ज के दलदल में उतर चुका है और अगर अब भी सच्चाई से मुंह मोड़ा गया तो आर्थिक उबरना असंभव हो जाएगा। 2016 में चीन की बेल्ट एंड रोड योजना से जुड़ने के बाद बांग्लादेश पर चीनी कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ा।

ढाका को चीन से 40 अरब डालर तक की वित्तीय प्रतिबद्धताओं की उम्मीद है, जिनमें 14 अरब डालर के संयुक्त परियोजना शामिल हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि देश का कर्ज जीडीपी अनुपात 34 प्रतिशत से बढ़कर 39 प्रतिशत के पार पहुंच गया।

विश्व बैंक की अंतरराष्ट्रीय ऋण रिपोर्ट 2025 के अनुसार बीते पांच वर्षों में बांग्लादेश का विदेशी कर्ज 42 प्रतिशत बढ़कर करीब 105 अरब डालर हो गया है। विदेशी कर्ज अब देश की निर्यात आय के लगभग 192 प्रतिशत के बराबर पहुंच चुका है, जबकि निर्यात का करीब 16 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ कर्ज चुकाने में खर्च हो रहा है।

आज भी कराह रहा है पाकिस्तान

जहां श्रीलंका पहले ही डिफाल्ट कर अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी झेल चुका है, वहीं पाकिस्तान आज भी आइएमएफ के सहारे और चीन के करीब 30 अरब डालर के कर्ज तले कराह रहा है।विशेषज्ञों की राय लगभग एकमत है कि यदि बांग्लादेश ने उधारी की नीति, चीनी परियोजनाओं की व्यवहारिकता और कर्ज की शर्तों में तुरंत पारदर्शिता और सख्त सुधार नहीं किए, तो उसकी आर्थिक कहानी श्रीलंका से कहीं अधिक दर्दनाक और पाकिस्तान से कहीं अधिक लंबी त्रासदी में बदल सकती है।

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