विदेशी नागरिक रहते सोनिया गांधी बनी भारत की वोटर; 3 साल तक मताधिकार का उपयोग भी!
14 दिसंबर को वोट चोरी रैली, मगर आरोपों की चिंगारी गांधी परिवार के घर से उठी!

देश की 95% जनता हिंदी बोलती — फिर चुनाव सुधार पर अंग्रेज़ी में भाषण क्यों राहुल?

क्राइम इंडिया टीवी डिजिटल डेस्क, मनोज कुमार सोनी। नई दिल्ली। भारत की नागरिकता लेने से पहले ही सोनिया गांधी भारत की मतदाता सूची में शामिल हो गईं। यह मामला आज भी कई सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल क्या भारत की चुनाव व्यवस्था को परिवारों के राजनीतिक प्रभाव के चलते नियमों से ऊपर रखा गया? और अगर ऐसा हुआ, तो क्या इसके लिए भी कभी जिम्मेदारों को कटघरे में खड़ा किया जाएगा?
विपक्ष की दलील यह है: सोनिया गांधी मूल रूप से इटली की नागरिक थीं। विवाह के बाद भारत आकर उन्होंने 1983 में भारतीय नागरिकता ली। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि वे 1980 में ही मतदाता बन चुकी थीं यानी, विदेशी नागरिक होते हुए उन्होंने मतदाता बनने का अधिकार प्राप्त कर लिया था और 1980 से 1983 के बीच उन्होंने अपने मताधिकार का प्रयोग भी किया।

9 दिसंबर को दिल्ली की अदालत द्वारा जारी नोटिस से यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। लोकसभा में चुनाव सुधार पर बोलते समय राहुल गांधी ने जितने तीखे सवाल मोदी सरकार पर उठाए, उतना ही जरूरी था कि वह अपनी माताजी से जुड़े इस गंभीर मामले पर भी सफाई देते। विपक्ष का नेता होना केवल आरोप लगाने का अधिकार नहीं, बल्कि गलत परंपराओं को स्वीकारना और उनसे जवाब मांगने का दायित्व भी है चाहे वह अपने ही घर से क्यों न शुरू होता हो।
यही विडंबना है 14 दिसंबर को कांग्रेस “वोट चोरी” के मुद्दे पर बड़ा प्रदर्शन करेगी, लेकिन विपक्ष की राजनीति जिस “चोरी” को मुद्दा बनाकर सड़क पर उतरेगी, क्या वो चोरी सबसे पहले उनके ही परिवार के घर से शुरू नहीं हुई? अगर विदेशी नागरिक रहते हुए मतदाता बनने जैसे आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सम्पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है।
सवाल केवल सोनिया गांधी का नहीं सवाल है चुनाव आयोग पर राजनीतिक हद तक दबाव रहा या नहीं? क्या उस समय सत्ता में बैठे नेताओं ने संस्थाओं को नियंत्रित करके नियमों को अपने अनुकूल मोड़ दिया था? राहुल गांधी अपने भाषण में संस्थाओं पर खतरे की बात करते हैं, पर क्या वह इस इतिहास पर अपनी राय देंगे जिसमें उनका परिवार खुद आरोपों के घेरे में है?
अब भाषण की बात नरेंद्र मोदी चाहे कोई भी मंच हो, राष्ट्रीय मुद्दों पर हमेशा हिंदी में बात करते हैं। इसका परिणाम यह है कि देश का सबसे सामान्य नागरिक भी उनकी बात खुद को सम्बोधित महसूस करता है। वहीं राहुल गांधी अंग्रेज़ी में बोलते हैं। जबकि अंग्रेज़ी देश की विशाल ग्रामीण आबादी के लिए अब भी पहुंच से बाहर है। लोकतंत्र में संवाद जितना व्यापक होगा, उतना ही मजबूत होगा। तो जब चुनाव सुधार जैसे संवेदनशील विषय पर चर्चा चल रही हो, तो जनता तक बात पहुंचाने में भाषा दीवार क्यों बन गई?
क्या कारण है कि राहुल गांधी हर बार जनता से दूरी बनाए रखने वाली भाषा चुनते हैं? क्या यह उनकी राजनीति को केवल अभिजात्य वर्ग तक सीमित करता है? इंग्लिश भाषणों के चलते उनका संदेश वही समझते हैं जो पहले ही राजनीति के जानकार हैं, लेकिन जनता का बड़ा हिस्सा उसी वक्त बाहर छूट जाता है। यह लोकतंत्र की प्रक्रिया में सहभागिता कम करता है, न कि चुनाव सुधार बढ़ाता है।
चुनाव सुधार का मुद्दा केवल उस सरकार पर निशाना साधने का माध्यम नहीं होना चाहिए जो सत्ता में है यह खुद अपनी पार्टी के इतिहास से भी ईमानदारी मांगता है। अगर राहुल गांधी सच्चे लोकतांत्रिक बदलाव का दावा करते हैं, तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि कांग्रेस के कार्यकाल में भी कई बार संस्थाओं पर अत्यधिक प्रभाव डाला गया चाहे वह चुनाव आयोग हो, चाहे वो न्यायपालिका हो।
आज देश पूछ रहा है यदि लोकतंत्र की रक्षा करनी है, तो क्या उसका आरंभ आत्मचिंतन से नहीं होना चाहिए? क्या राजनीतिक परिवारों को भी कानून के सामने आम नागरिक की तरह खड़ा नहीं होना चाहिए? क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल विरोधियों को कटघरे में खड़ा करना है, या फिर खुद से जुड़े सवालों के जवाब देना भी है?
अगर सचमुच विपक्ष जनता की आवाज़ बनना चाहता है, तो उसे अपनी बात देश की भाषा में रखनी ही होगी। चुनाव सुधार का संदेश जनता तक पहुंचे — और जनता केवल संसद की दीवारों में सीमित अंग्रेज़ी नहीं, बल्कि अपनी बोली में सच सुनना चाहती है। सवाल बहुत हैं, जवाब कम। और बेहतर होता कि 9 दिसंबर को राहुल गांधी इन सवालों का जवाब देते, न कि उन्हें टाल जाते।क्योंकि सुधार की शुरुआत वहीं से होती है जहाँ गलती हुई हो।



