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बच्चों की सुरक्षा बनाम सिस्टम की जवाबदेही: POCSO मामला सुर्खियों में।

POCSO मामले में पुलिस की भूमिका पर बहस, पारदर्शी जांच की मांग तेज।

बड़ी खबर | POCSO जैसे जघन्य अपराध से जुड़ी जानकारी, सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल।

मनोज कुमार सोनी। बीकानेर  के मुक्ता प्रसाद पुलिस थाना क्षेत्र से POCSO अधिनियम से जुड़े एक और अत्यंत गंभीर मामले की जानकारी सामने आने का दावा किया जा रहा है, जिसने कानून, प्रशासन और मीडिया की भूमिका को लेकर गहन बहस छेड़ दी है। सूत्रों के अनुसार यह जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर अधिवक्ता गोवर्धन सिंह द्वारा साझा की गई है। यह स्पष्ट किया जाता है कि गोवर्धन सिंह इस मामले के परिवादी या विधिक प्रतिनिधि (एडवोकेट) नहीं हैं, बल्कि उन्होंने सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध तथ्यों और अपनी जानकारी के आधार पर पोस्ट साझा की है। फेसबुक पर साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस कथित मामले में दैनिक भास्कर समूह से जुड़े कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों के नामों का उल्लेख किया गया है।

जानकारी में सुधीर अग्रवाल और एल. पी. पंत के नाम सामने आने का दावा किया गया है। इसके साथ ही पीयूष मिश्रा, नवीन शर्मा और मनमोहन अग्रवाल के नाम भी सहयोगी के रूप में लिखे जाने की बात कही जा रही है। यह मामला इसलिए अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि यह POCSO अधिनियम से जुड़ा बताया जा रहा है, जो नाबालिगों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों से संबंधित है और जिसे भारतीय कानून में सबसे कठोर और संवेदनशील कानूनों में से एक माना जाता है।

कानून विशेषज्ञों के अनुसार, POCSO जैसे मामलों में नाम, पद या प्रभाव कोई मायने नहीं रखता, बल्कि केवल तथ्यों, साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही कार्रवाई होनी चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या इस जानकारी के आधार पर पुलिस संज्ञान लेकर जांच की प्रक्रिया शुरू करेगी या नहीं। मामले को लेकर बीकानेर के पुलिस अधीक्षक कावेंद्र सागर (IPS) की भूमिका पर सबकी निगाहें टिकी हैं।कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी भी माध्यम से POCSO से संबंधित जानकारी पुलिस के संज्ञान में आती है, तो प्रारंभिक जांच और FIR दर्ज करना कानूनी जिम्मेदारी मानी जाती है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि यदि इस मामले में स्थानीय स्तर पर निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई नहीं होती है, तो संबंधित पक्ष उच्च न्यायिक मंच का रुख कर सकते हैं।
यह मामला केवल एक व्यक्ति, संस्था या मीडिया समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि
क्या कानून सभी के लिए समान है या प्रभावशाली नामों के सामने व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है।

यह भी स्पष्ट किया जा रहा है कि पत्रकारिता का उद्देश्य आरोप तय करना नहीं, बल्कि सवाल उठाना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।POCSO जैसे मामलों में संवेदनशीलता, निष्पक्षता और पीड़ित की सुरक्षा सर्वोपरि होती है।किसी भी स्तर पर लापरवाही, दबाव या समझौता न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

चाहे आरोपी कोई भी हो मीडिया से जुड़ा हो,प्रभावशाली हो, या किसी भी पद पर हो यदि आरोप सामने आते हैं, तो जांच भी उतनी ही सख्त और पारदर्शी होनी चाहिए। यह खबर किसी को दोषी ठहराने का दावा नहीं करती, बल्कि कानून के अनुसार कार्रवाई और निष्पक्ष जांच की मांग करती है।

यह समाचार एडवोकेट गोवर्धन की फेसबुक इंस्टाग्राम पर वायरल है। कानून के अनुसार, दोष सिद्ध होने तक सभी व्यक्ति निर्दोष माने जाते हैं। अब देखना यह है कि क्या पुलिस इस जानकारी पर संज्ञान लेती है, क्या FIR दर्ज होती है,और क्या POCSO जैसे गंभीर कानून में कानून का डर सबके लिए समान साबित होता है। यह मामला केवल खबर नहीं, बल्कि न्याय, स्वाभिमान और जिम्मेदार पत्रकारिता की कसौटी है।डर, दबाव और संबंधों से ऊपर सच दिखाना ही पत्रकारिता है।

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