पोक्सो पीड़िता को धमकाने का मामला, कोर्ट का सख़्त रुख,अख़बार मालिक और संपादक पर FIR के आदेश।
नाबालिग पीड़िता की गरिमा से खिलवाड़, न्यायालय ने माना गंभीर आपराधिक कृत्य।


मनोज कुमार सोनी। जयपुर। पॉक्सो कानून से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील प्रकरण में न्यायालय ने सख़्त रुख अपनाते हुए बड़ा आदेश पारित किया है। नाबालिग शिकायतकर्ता बालिका को धमकाने और मानसिक दबाव बनाने के गंभीर आरोपों को संज्ञान में लेते हुए न्यायालय ने एक स्थानीय अख़बार के मालिक सुधीर अग्रवाल एवं अख़बार के संपादक एल पी पंत के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश दिए हैं। यह मामला POCSO अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मूल शिकायत से जुड़ा हुआ है, जिसमें पीड़िता पहले ही न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रही है।
कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, अख़बार में प्रकाशित की गई खबरों के माध्यम से नाबालिग शिकायतकर्ता और उसके परिजनों को डराने, बदनाम करने और दबाव में लेने का प्रयास किया गया।न्यायालय ने इसे अत्यंत गंभीर मानते हुए कहा कि POCSO जैसे मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप कानून के खिलाफ है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाबालिग पीड़िता की पहचान गरिमा और सुरक्षा सर्वोपरि है और मीडिया को इसका विशेष ध्यान रखना अनिवार्य है।अदालत के अनुसार प्रकाशित खबरें न तो तथ्यात्मक थीं और न ही निष्पक्ष पत्रकारिता के मानकों पर खरी उतरती थीं।कोर्ट ने माना कि इन खबरों का उद्देश्य सूचना देना नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना और शिकायतकर्ता को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना प्रतीत होता है।
न्यायालय ने कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि वह किसी नाबालिग पीड़िता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे। अदालत ने टिप्पणी की कि झूठी, भ्रामक और दबाव बनाने वाली खबरें न्याय में बाधा डालने के समान हैं।मामले में यह भी सामने आया कि खबरों में ऐसे शब्दों और संकेतों का प्रयोग किया गया जिससे सीधे तौर पर बालिका और उसके परिवार को भयभीत करने का प्रयास हुआ।न्यायालय ने इसे POCSO अधिनियम के तहत अलग से दंडनीय अपराध माना है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि POCSO मामलों में पीड़िता को धमकाना, बदनाम करना या डराना कानून की गंभीर अवहेलना है। इस प्रकरण में अख़बार मालिक सुधीर अग्रवाल पर झूठी खबरें प्रकाशित कराने और पीड़िता के खिलाफ वातावरण बनाने का आरोप है। वहीं अख़बार के संपादक एल पी पंत पर संपादकीय स्तर पर इन खबरों को स्वीकृति देने और प्रकाशित करने की जिम्मेदारी तय की गई है।न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संपादक की भूमिका केवल तकनीकी नहीं बल्कि कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी की भी होती है।
कानूनी जानकारों के अनुसार यदि इस मामले में आरोप सिद्ध होते हैं तो अख़बार मालिक को सात वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है। साथ ही भारी जुर्माना एवं अन्य दंडात्मक कार्रवाई भी संभव है। न्यायालय ने पुलिस को निर्देशित किया है कि वह तत्काल FIR दर्ज करे और निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच में किसी भी प्रकार की ढिलाई या पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पीड़िता की सुरक्षा को लेकर भी विशेष निर्देश जारी किए गए हैं ताकि उसे भविष्य में किसी प्रकार का डर या दबाव न झेलना पड़े। यह मामला केवल एक नाबालिग पीड़िता तक सीमित नहीं है बल्कि मीडिया की जिम्मेदारी पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।
न्यायालय ने कहा कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है लेकिन उसकी भूमिका न्याय को कमजोर करने की नहीं बल्कि मजबूत करने की होनी चाहिए,POCSO मामलों में सनसनीखेज, भ्रामक और दबाव बनाने वाली पत्रकारिता न केवल अनैतिक है बल्कि आपराधिक कृत्य भी है।कोर्ट ने दो टूक कहा कि बाल यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अत्यधिक संवेदनशीलता अपेक्षित है। इस आदेश के बाद मीडिया जगत में भी हलचल देखी जा रही है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश भविष्य में झूठी और दबाव बनाने वाली खबरों पर नकेल कसने का काम करेगा। पीड़िता पक्ष के अधिवक्ताओं ने न्यायालय के इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह आदेश उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो अपनी पहुंच और ताकत का दुरुपयोग कमजोर वर्गों के खिलाफ करते हैं।
वहीं इस मामले में नामजद आरोपियों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।पुलिस सूत्रों के अनुसार न्यायालय का आदेश प्राप्त होते ही FIR दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।आने वाले समय में इस मामले में और भी अहम खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
यह पूरा प्रकरण साफ संदेश देता है कि POCSO कानून के अंतर्गत पीड़ित के अधिकारों से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है।न्यायालय का यह आदेश न केवल एक केस का फैसला है बल्कि समाज, मीडिया और व्यवस्था तीनों के लिए एक सख़्त चेतावनी है।



