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देसी घी, बाजरा और गुड़: कड़ाके की ठंड को भी मात देता है ‘हरियाणा’ का देसी खानपान

सर्दियों की पहली धूप जैसे ही खेतों पर उतरती है, हवा में एक अलग ही मिठास घुल जाती है। कुनकुनी धूप, दूर से आती चूल्हे की लकड़ियों की सुगंध, और आंगन में …और

HighLights

  1. सर्दियों में बाजरा, देसी घी और गुड़ का महत्व
  2. जाड़े में शरीर का ख्याल रखेगा हरियाणा का खानपान
  3. परंपरागत भोजन से होती है रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि

 सर्दियों की शुरुआत होते ही घरों में पिन्नियां सिजने लगती हैं। घी, गोंद, आटा, सूजी और मेवा सब एक साथ मिलकर शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा बन जाती हैं। तिल- गुड़, रेवड़ी और गज्जक सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि देहात की ” हीटर ” हैं, जो जाड़े की ठिठुरन को भीतर से पिघला देती हैं और सबसे बड़ी बात- गांव में सर्दियों का खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं होता, यह रिश्तों को जोड़ने की कला है । चूल्हे के पास बैठकर पूरा घराना साथ खाते हुए गर्माहट की यह परम्परा आज भी जिंदा है। चूल्हे के पास बैठकर कोई रोटी सेंकता, कोई साग परोसता और कोई गुड़ के टुकड़े बांटता।

साग-सब्जियां-खेत से थाली तक का सफर

सर्दियों में सरसों, बथुआ, मेथी, चौराई – ये साग रसोई की पहचान बन जाते हैं। विज्ञान भी मानता है कि ये शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाते हैं और हरियाणा की असली पहचान- -दूध-दही ही तो है। दही यहां सिर्फ भोजन नहीं, एक जीवनशैली है – तनाव कम करे, दिमाग शांत रखे और नींद बेहतर बनाए ।

रसोई में शुरू होती है सर्दियों की कहानी

भोर होते ही गांव की रसोई में सबसे पहले चूल्हा सजता है । चक्की से पिसा ताजा बाजरा, हाथों की गर्माहट, और चूल्हे की आंच – इनसे बनी बाजरे की रोटी सर्दियों का असली तोहफा होती है । किसान सदियों से इसे ‘सर्दियों का राजा’ मानते आए हैं। जब खेतों में ओस बर्फ की चादर बनकर गिरती है, तब यही रोटी शरीर को भीतर से ताप देती है। रोटी का एक टुकड़ा जैसे कहता है- “चिंता ना कर, ठंड तने छू भी ना पावेगी।” आज मेडिकल साइंस भी मान चुका है कि बाजरा आयरन, फाइबर, प्रोटीन और गर्माहट का खजाना है। तभी तो खेत में पसीना बहाने वाले किसान गर्व से कहते हैं- “बाजरे की ताकत सै, आदमी ठंडी में भी कूद पड़ै।”

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हिसार के गांव जुगलान में घर पर सुबह -सुबह बाजरे की रोटी बनाती हुई गृहिणी संतोष। फोटो सौजन्य: बलवंत सिह

देहात की सर्दियों का असली दिल

बाजरे की खिचड़ी रोज नहीं बनती, यह मन के ज्वार पर बनती है। जब रोटी से मन ऊब जाए तो मां खिचड़ी चढ़ा देती है। अंगीठी पर बनी रोटियों के साथ एक कटोरी में घी – बूरा जरूर रखा होता है- जो सिर्फ मिठास नहीं, बल्कि ताकत, रौनक और तृप्ति तीनों देता है।

वैज्ञानिक नजर में हरियाणवी भोजन

निश्चित ही वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हरियाणा का पारंपरिक सर्दियों का खान-पान यानी वह सब, जो आधुनिक विज्ञान सभी को सीखने की सलाह देता है, वह हरियाणा के किसान, दादी-नानी और गांव की रसोई सदियों से करके दिखा रहे हैं।

  • शरीर को प्राकृतिक रूप से गर्म रखता है
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता
  • पाचन को मजबूत बनाता है
  • मानसिक स्वास्थ्य बेहतर करता है
  • ऊर्जा देता है और थकान घटाता है

गांव की दादी-नानी और किसान सदियों से वह सब करते आए हैं, जिसे आज विज्ञान- सुपरफूड संस्कृतिक कह रहा है।

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हिसार के गांव जुगलान में घर पर आज के दौर में प्राचीन तरीके से हाथ से दूध बिलोती महिला। फोटो सौजन्य: श्वेता

हरियाणा भारत की अन्नपूर्णा का जाड़े वाला विज्ञान

हरियाणा, जिसे ‘भारत की अन्नपूर्णा’ भी कहा जाता है, अपनी कृषि भूमि, सरल ग्रामीण परिवेश और सदियों पुरानी जीवनशैली के लिए देश भर में विख्यात है। यहां का रहन-सहन और खान-पान केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहां के मौसम, श्रम और शारीरिक आवश्यकता को समझने वाला एक पुरातन विज्ञान है। जैसे ही उत्तर भारत में कड़ाके की सर्दी (जाडे ) का आगमन होता है, घरों का मेन्यू अचानक बदल जाता है। हमारा बदलाव केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि शरीर को भीतर से मजबूत, गर्म और मानसिक रूप से शांत रखने के लिए होता है। यहां के ग्रामीण खान-पान, विशेषकर सर्दियों का भोजन, किसानों और पहलवानों की तरह ही ताकतवर और निश्छल है, जिसका आधार है – बाजरा, देसी घी, दूध और गुड़ । यह सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है, जो शारीरिक और मानसिक मजबूती का अचूक नुस्खा है और दुर्भाग्यवश, आधुनिकता की दौड़ में जिसे हम भूलते जा रहे हैं।

समुदाय के साथ बैठकर खाने की परम्परा मानसिक मजबूती भी देती है

शहरी जीवन में प्राय: जहां भोजन को त्यागने या कम करने का चलन है, वहीं ग्रामीण हरियाणा में जाड़े में भरपेट भोजन करने का आग्रह किया जाता है, क्योंकि यह प्रकृति द्वारा शरीर को अगले छह महीने के लिए तैयार करने का समय होता है। यह भोजन व्यक्ति को खेतों में लंबे समय तक टिके रहने की शारीरिक दृढ़ता प्रदान करता है, साथ ही परिवार और समुदाय के साथ बैठकर खाने की परम्परा मानसिक मजबूती और सामाजिक जुड़ाव भी सुनिश्चित करती है।

सर्दी में स्वाद और विज्ञान का संगम

सर्दी आते ही मानो रसोई में देसी विज्ञान का जादू उतर आता है। मिट्टी के चूल्हे पर सिकती बाजरे की रोटियां, देसी घी की खुशबू और गुड़ की मिठास न सिर्फ शरीर को गरमाहट देती हैं, बल्कि ऊर्जा भी बढ़ाती हैं। यहां भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि ऋतु और श्रम के अनुसार गढ़ी जीवनशैली का हिस्सा है। बाजरे की खिचड़ी, सरसों के साग और गोंद के लड्डू हर व्यंजन, शरीर में स्नेह, ताप और ताकत का संतुलन बनाए रखता है। चौपालों में सामूहिक भोजन, परिवार संग थाल बांटने की परंपरा और देसी घी की हर थाली में गूंजती संस्कृति, हरियाणा की पौष्टिक विरासत को जीवित रखे हुए है। यह खान-पान सिर्फ सर्दी का उपाय नहीं, बल्कि शरीर, मन और समाज को जोड़े रखने वाला एक साझा जीवनदर्शन है।

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