आस्था

गोवर्धन पूजा भक्ति का अटूट पर्व,जब इंद्र का अभिमान टूटा और आस्था की विजय हुई।

प्रकृति की रक्षा का पर्व बना गोवर्धन, भगवान श्रीकृष्ण ने सिखाया पर्यावरण और ईश्वर एक हैं।

जब संकट आए, तो कान्हा संभाल लेते हैं संसार। क्राइम इंडिया टीवी डिजिटल डेस्क

मनोज कुमार सोनीजयपुर। आस्था और श्रद्धा का पर्व गोवर्धन पूजा इस वर्ष बुधवार, 22 अक्टूबर को पूरे देश में धूमधाम और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व केवल पूजा का नहीं, बल्कि भक्ति, विश्वास और भगवान श्रीकृष्ण के संरक्षण के वचन का प्रतीक है  वह वचन जो उन्होंने ब्रजवासियों को उस दिन दिया था जब इंद्र का अहंकार चरम पर था और मूसलाधार वर्षा ने पूरे ब्रज को डुबाने की ठान ली थी।

कहते हैं कि जब इंद्र ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए सात दिन और सात रातों तक लगातार वर्षा की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने छोटी सी अपनी कनिष्ठिका (छोटी उंगली) पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया था। उस पर्वत के नीचे सारे ब्रजवासी, गौवंश, पक्षी, बच्चे और महिलाएँ सुरक्षित रहे। उस दिन से यह पर्व “गोवर्धन पूजा” के नाम से जाना गया और हर वर्ष दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है।

इंद्र का अभिमान और कृष्ण का करुणामय वचन

इंद्र का घमंड जब सात दिनों तक बरसता रहा, तब ब्रजवासी घबराकर श्रीकृष्ण के शरण आए। गोपाल ने मुस्कुराते हुए कहा “मत डरो, मैं हूँ न तुम्हारे साथ।”और यह वाक्य उस दिन से भक्तों के हृदय में अमर हो गया।

जब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन उठाया, तब इंद्र के बादलों का साम्राज्य भी थरथरा उठा। देवताओं को अहसास हुआ कि सच्ची शक्ति भक्ति में है, अभिमान में नहीं। इंद्र ने अंततः भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और वचन दिया कि वह कभी भी अपने भक्तों पर क्रोध नहीं करेंगे।

आज भी जब भक्त गोवर्धन पूजा करते हैं, तो वह केवल एक पर्व नहीं मनाते, बल्कि उस विश्वास की परंपरा को निभाते हैं जो भगवान ने अपने भक्तों को दी थी — “जब संकट आएगा, तब मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।”

गाँवों में गोवर्धन पर्व की तैयारी चरम पर

दौसा, सिकंदरा, लवाण, बसवा, महवा सहित जिले के सभी गाँवों में गोवर्धन पूजा की तैयारी शुरू हो चुकी है। गाँवों के चौपालों, मंदिरों और गोशालाओं में आज से ही सफाई और सजावट का कार्य किया जा रहा है।

ग्रामवासी पारंपरिक गोबर, मिट्टी और फूलों से गोवर्धन पर्वत का प्रतिरूप बनाते हैं। उसकी पूजा दूध, दही, घी, गुड़ और चावल से की जाती है। महिलाएँ मंगल गीत गाती हैं गोवर्धन धरन दारी, संकट मोचन प्यारे, तूने ही बचाया ब्रज को, बारिश के भँवर से सारे।यह गीत हर गाँव में गूँजता है और वातावरण में भक्ति का रंग भर देता है।

 गौ सेवा और गोवर्धन पूजा का पवित्र संबंध

गोवर्धन पूजा का सबसे बड़ा महत्व गौ सेवा से जुड़ा है। इस दिन गायों को स्नान कराकर, उनकी सींगों में हल्दी, रोली और तेल लगाया जाता है। गायों के गले में फूलों की माला डाली जाती है और पूजन के बाद उन्हें हरी घास, गुड़ और आटे की लोई खिलाई जाती है।

क्योंकि श्रीकृष्ण स्वयं गोपाल कहलाए अर्थात् गौवंश के रक्षक। इसलिए यह दिन न केवल पर्वत की पूजा का, बल्कि धरती माता और गौमाता के आभार का दिन है। गाँवों में जब सैकड़ों गायें सजी-धजी निकलती हैं और बच्चे उनके साथ “गोवर्धन महाराज की जय” के जयकारे लगाते हैं, तो पूरा वातावरण आनंद और श्रद्धा से भर जाता है।

धार्मिक मान्यता के साथ-साथ गोवर्धन पूजा का वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व भी है। यह पर्व हमें प्रकृति के संरक्षण की प्रेरणा देता है। गोवर्धन पर्वत, गाय, वृक्ष, मिट्टी और जल ये सब जीवन के आधार हैं। जब हम इनकी पूजा करते हैं, तो हम दरअसल पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेते हैं।

धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है– गोवर्धन पूजा से भूमि पवित्र होती है, जल शुद्ध होता है और वायु में सुख की ऊर्जा फैलती है।”इस दिन गाँवों में तालाबों, नदियों और बगीचों की सफाई भी की जाती है, जिससे यह पर्व स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का उत्सव बन जाता है।

गोवर्धन की परिक्रमा भक्ति का चरम रूप।

मथुरा, वृंदावन और बरसाना में इस दिन लाखों श्रद्धालु गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। लगभग 21 किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा सच्चे विश्वास और त्याग का प्रतीक मानी जाती है। भक्त नंगे पैर, भजन गाते हुए गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं।

माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से गोवर्धन परिक्रमा करता है, उसके जीवन के सभी संकट मिट जाते हैं और परिवार में सुख-शांति आती है। स्थानीय पंडितों का कहना है गोवर्धन पूजा केवल पर्व नहीं, बल्कि जीवन की वह सीख है कि जब हम ईमानदारी से भक्ति करते हैं, तब खुद भगवान हमारे रक्षक बन जाते हैं।

आज भी आस्था में डूबा समाज विश्वास की लौ अमर है

दीपावली के अगले दिन जब सूरज की किरणें गाँव के आँगन में पड़ती हैं, तब मिट्टी की सुगंध और गोबर से बनी गोवर्धन प्रतिमा भक्तों के हृदय को छू जाती है। बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग सब मिलकर आरती करते हैं और दूध-दही का अर्घ्य अर्पित करते हैं। पूजा के बाद लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और कहते हैं कान्हा हमारे साथ हैं, अब कोई भय नहीं।

यह भावना ही इस पर्व की आत्मा है भय से भरोसे की यात्रा।कृष्ण की करुणा आज भी जीवित है।आज का समाज चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए, लेकिन जब कठिनाई आती है, तो हर भक्त का मन श्रीकृष्ण की ओर मुड़ता है। गोवर्धन पूजा यही सिखाती है कि ईश्वर अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ते।

जब इंद्र का अभिमान मिटा, तो यह संसार सीख गया कि शक्ति का स्रोत केवल ईश्वर की कृपा और भक्त की निष्ठा में है। कन्हैया ने उस दिन केवल पर्वत नहीं उठाया था, उन्होंने मानवता को यह संदेश दिया था जब संकट बरसे, तो हाथ जोड़ो नहीं, श्रद्धा उठाओ मैं तुम्हारे साथ हूँ।

भक्ति, करुणा और एकता का पर्व

गोवर्धन पूजा हर वर्ष समाज को जोड़ने का कार्य करती है। इस दिन अमीर-गरीब, किसान-व्यापारी सब एक साथ पूजा में शामिल होते हैं। कोई फूल चढ़ाता है, कोई दही-दूध, और कोई बस श्रद्धा। क्योंकि भगवान के सामने केवल भक्ति ही सबसे बड़ा धन है। गाँवों में शाम को सामूहिक आरती होती है। भजन मंडलियाँ गाती हैं गोवर्धन धरन दारी, तू है संकट हारी…और वातावरण में प्रेम, भक्ति और करुणा की गूंज फैल जाती है।

संदेश जब भरोसा अडिग हो, तो चमत्कार निश्चित है

भगवान श्रीकृष्ण का यह पर्व हमें सिखाता है कि विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाता। चाहे दुनिया में कितनी ही विपत्ति क्यों न आए, जब मन सच्चा और भक्ति निर्मल हो, तब ईश्वर स्वयं रक्षा करते हैं।

आज भी लाखों भक्त हर वर्ष इस दिन गोवर्धन की मिट्टी माथे पर लगाते हैं और कहते हैं हे गोवर्धन नाथ, जैसे उस दिन ब्रजवासियों की रक्षा की, वैसे ही आज भी हमारे परिवार का साया बने रहो।

गोवर्धन पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जब तूफ़ान आता है, तो कन्हैया अपनी उंगली उठा देते हैं ताकि कोई भक्त भीग न जाए।जो ईश्वर पर भरोसा करता है, उसका कोई बाल भी बाँका नहीं होता।

इसलिए इस वर्ष की गोवर्धन पूजा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति की परीक्षा और भरोसे की पुनः स्थापना है। हर दीप, हर गोवर्धन, और हर भक्त का विश्वास यही भारत की सच्ची ताकत है।

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