आस्था से खिलवाड़: मंदिर को ‘अवैध’ बताने वाले अधिकारी पर कार्रवाई, पर बड़े नामों पर चुप्पी!
जयपुर में धार्मिक भावनाओं का अपमान—JDA की शर्मनाक करतूत पर जनता में उबाल

सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: भगवान शिव मंदिर के नाम नोटिस लगाने वाले JDA अधिकारी को निलंबित, अब बड़े अधिकारियों पर कब गिरेगी गाज?
मनोज कुमार सोनी/जयपुर। जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) में कार्यरत प्रवर्तन अधिकारी अरुण कुमार पूनिया को निलंबित कर दिया गया है। लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ छोटे अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर बड़े अधिकारी खुद को बचाते रहेंगे? क्या धार्मिक भावनाओं की अनदेखी करने वाले, आदेश देने वाले, निरीक्षण करने वाले और फाइल पास करने वाले अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी? या यह निलंबन सिर्फ जनता का गुस्सा शांत करने का एक ढोंग है? घटना वैशाली नगर क्षेत्र के गांधीपथ स्थित भगवान महादेव मंदिर से जुड़ी है। सड़क चौड़ीकरण अभियान के तहत JDA की टीम अतिक्रमण हटाने निकली थी। दुकानों और मकानों पर कार्रवाई होनी थी, लेकिन दिमागी स्तर की हदें पार करते हुए JDA अफसरों ने नोटिस सीधे “भगवान शिव मंदिर” के नाम चस्पा कर दिया। ना किसी पुजारी का नाम, ना किसी समिति का। सीधा “भगवान शिव” को जवाब देने का आदेश!
किस कानून में भगवानों को नोटिस भेजने का प्रावधान है? कौन-सा अधिकारी इतना अंधा हो गया कि मंदिर पर लटकी आस्था को भी “अवैध” लिख दिया? इसी शर्मनाक हरकत के बाद पूरे शहर में रोष फैल गया। धार्मिक संगठनों ने विरोध दर्ज कराया। सोशल मीडिया पर JDA प्रशासन की जमकर फजीहत हुई। मजबूरन JDA सचिव निशांत जैन को प्रवर्तन अधिकारी को निलंबित करना पड़ा। आदेश में स्पष्ट लिखा गया है कि निलंबन अवधि में नियमानुसार भत्ते मिलेंगे और मुख्यालय एडीजीपी (कार्मिक) कार्यालय रहेगा।
कौन है असली दोषी? क्या अकेले पूनिया ने यह नोटिस तैयार किया? क्या वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी के बिना कोई नोटिस जारी हो सकता है? क्या इस पूरे आदेश पर साइन करने वालों पर शिकंजा कसने की हिम्मत शासन में है? जनता जानती है कि JDA में हर कार्रवाई फाइलों में ऊपर तक चढ़ती है। ऐसे में सिर्फ एक प्रवर्तन अधिकारी पर कार्रवाई दिखावा नहीं तो और क्या है? जयपुर भगवानों का शहर है। यहां मंदिर सिर्फ इमारत नहीं होते, आस्था होते हैं। लेकिन लगता है कि कुछ अधिकारी इन भावनाओं की कीमत फाइलों की धूल से भी कम आंकते हैं। धर्मस्थलों के प्रति इस तरह की संवेदनहीनता न केवल गलत बल्कि कानूनन अपराध भी है।
लापरवाह अधिकारी बन गए जनता के शत्रु यह कोई पहला मौका नहीं है जब JDA की मनमानी जनता के सिर चढ़कर बोली हो— कभी घरों को “अतिक्रमण” बताकर तोड़ दिया कभी दुकानों को बिना नोटिस सील कर दिया कभी गरीबों की छत छीन ली और अब मंदिर को अवैध ठहरा दिया सरकार द्वारा दिए गए अधिकार जनता की सुविधा के लिए होते हैं, न कि डराने-धमकाने के लिए। लेकिन JDA के कुछ अफसर खुद को राजा और जनता को प्रजा समझ बैठे हैं। कार्रवाई ऊपर तक होनी चाहिए
अगर सच्चाई में पारदर्शिता है, तो— मंदिर को अवैध ठहराने के आदेश किसने दिए? जांच अधिकारी कौन था? नोटिस का प्रारूप किसने तैयार किया? वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका क्या थी? इन सभी नामों को जनता के सामने लाना होगा। केवल एक अधिकारी पर तलवार चलाकर असली गुनहगारों को बचाना, न्याय नहीं—नाटक है।
लोगों की मांग नोटिस आदेश रद्द किया जाए, धार्मिक स्थलों की सूची और सर्वे दोबारा हो, उच्चस्तरीय जांच कमेटी बने, बड़े अफसरों पर भी विभागीय कार्रवाई हो, मंदिर प्रबंधन से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी जाए। सरकार ट्विटर पर नहीं, जमीन पर दिखे मुख्यमंत्री और नगरीय विकास मंत्री ट्वीट कर अपनी उपलब्धियाँ गिनाते रहते हैं, पर असली प्रशासनिक सुधार कहाँ है?
नीचे तक बैठे अफसर जनता से ऐसे पेश आते हैं जैसे जनता नहीं, उनकी जागीर हो। अगर ऐसे संवेदनहीन, गैर-जिम्मेदार अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसा गया, तो जनता का धैर्य जवाब देगा और सवालों का तूफान मंत्रालय की दीवारें भी हिला देगा। भगवान पर नोटिस चस्पा करने का अपराध माफी का पात्र नहीं है। इस मामले की जिम्मेदारी सिर्फ पूनिया की नहीं, पूरी उस व्यवस्था की है जो जनता की आस्था को पैरों तले रौंदने लगी है। अब देखना यह है—क्या सरकार धार्मिक भावनाओं के अपमान पर सच्ची कार्रवाई करेगी? या फिर हमेशा की तरह एक अफसर की बलि देकर मामला रफा-दफा कर देगी?



