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अधिवक्ता समाज का नेतृत्व मौन क्यों? चेयरमैन से खुले जवाब की मांग।

वायरल वीडियो से मचा घमासान, बार काउंसिल अध्यक्ष की चुप्पी पर उठे सवाल।

           हाइलाइट्स

न्यायपालिका से उम्मीद, प्रदेश की गिरती साख बचाने की अपील।

नार्को टेस्ट को तैयार गोवर्धन सिंह, जांच एजेंसियों की खामोशी क्यों?

मनोज कुमार सोनी। राजस्थान जयपुर इन दिनों सोशल मीडिया पर अधिवक्ता गोवर्धन सिंह पिछले पाँच–छह वर्षों से सिस्टम से टकराता एक वकील, जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ बना प्रदेश की कानूनी और सामाजिक हलचलों के बीच इन दिनों अधिवक्ता गोवर्धन सिंह का नाम तेजी से चर्चा में है।पिछले पाँच से छह वर्षों से अधिवक्ता गोवर्धन सिंह लगातार सरकारी तंत्र, प्रशासनिक कारनामों और कथित भ्रष्ट व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

उनका दावा है कि वे केवल आरोप नहीं बल्कि तथ्यों और दस्तावेज़ों के साथ अपनी बात प्रदेश की जनता और अधिवक्ता समुदाय के सामने रखने की कोशिश कर रहे हैं।अधिवक्ता गोवर्धन सिंह का मानना है कि एक विद्वान, निडर ,साहसी,अधिवक्ता होने के नाते भ्रष्टाचार और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ बोलना अपराध नहीं बल्कि संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।उनके अनुसार यदि समाज में पनप रहे “कैंसर” को समय रहते उजागर और नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।

इन दिनों सोशल मीडिया पर अधिवक्ता गोवर्धन सिंह का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है।इस वीडियो में वे बार काउंसिल राजस्थान के अध्यक्ष भुवनेश शर्मा पर गंभीर आरोप लगाते हुए तीखी भाषा में सवाल करते दिखाई दे रहे हैं।वीडियो में उनका लहजा आक्रोशपूर्ण है और वे बार-बार यह प्रश्न उठा रहे हैं कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद बार काउंसिल का नेतृत्व मौन क्यों है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बार काउंसिल राजस्थान के अध्यक्ष भुवनेश शर्मा अधिवक्ता गोवर्धन सिंह के आरोपों का जवाब देंगे या नहीं?अधिवक्ता समुदाय के बीच यह चर्चा आम होती जा रही है कि जब सवाल सीधे संस्था और उसके नेतृत्व पर उठ रहे हों तो चुप्पी किस मजबूरी का संकेत है।यह मुद्दा केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे अधिवक्ता समाज और उसके प्रतिनिधित्व का बताया जा रहा है।

क्योंकि बार काउंसिल का अध्यक्ष केवल एक पदाधिकारी नहीं बल्कि हजारों अधिवक्ताओं का प्रतिनिधि माना जाता है।सोशल मीडिया पर यह भी चर्चा है कि अधिवक्ता गोवर्धन सिंह स्वयं अपने नार्को टेस्ट की मांग कर चुके हैं।

उनका कथन है कि यदि जांच एजेंसियां निष्पक्ष हैं तो वे किसी भी तरह की वैज्ञानिक जांच के लिए तैयार हैं।हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि यदि अदालती आदेश या सहमति के बावजूद ऐसा कोई टेस्ट प्रस्तावित है, तो जांच एजेंसियां उस दिशा में आगे क्यों नहीं बढ़ रहीं।

इसी चुप्पी को लेकर शासन और प्रशासन के बीच “कुछ न कुछ पकने” की अटकलें भी लगाई जा रही हैं, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।सरकार के नुमाइंदों और संबंधित एजेंसियों की खामोशी ने इन सवालों को और गहरा कर दिया है।

इस पूरे विवाद में कुछ मीडिया संस्थानों और उनके प्रतिनिधियों के नाम भी सोशल मीडिया चर्चाओं में सामने आ रहे हैं। अधिवक्ता गोवर्धन सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों को लेकर संबंधित पक्षों की ओर से अब तक कोई स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया है।

मामले ने अब केवल एक व्यक्ति या संस्था से आगे बढ़कर न्यायपालिका की भूमिका पर भी ध्यान खींचा है।सार्वजनिक मंचों पर यह अपील की जा रही है कि यदि प्रदेश सरकार और व्यवस्था की साख को कोई बचा सकता है, तो वह केवल न्यायपालिका है।

न्यायपालिका से यह अपेक्षा जताई जा रही है कि वह अधिवक्ता गोवर्धन सिंह, उनके आरोपों और उनके द्वारा चलाए जा रहे अभियान की निष्पक्ष पड़ताल करे।साथ ही यदि आरोप निराधार हों तो स्थिति स्पष्ट की जाए और यदि तथ्यों में दम हो तो उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। यह मामला एक बड़े सवाल को जन्म देता है

क्या सिस्टम से सवाल पूछना अपराध है या लोकतंत्र की बुनियाद?और क्या संस्थाओं की चुप्पी संयोग है या संकेत?फिलहाल प्रदेश की निगाहें बार काउंसिल, जांच एजेंसियों और न्यायपालिका की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।क्योंकि इस प्रकरण में केवल एक अधिवक्ता नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता दांव पर बताई जा रही है।यह पूरी पोस्ट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर गजेंद्र सिंह राठौड़ नामक अकाउंट से वायरल हो रही है, जिसे बड़ी संख्या में लोग साझा कर रहे हैं।

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