अंतरराष्ट्रीय

राजनीतिक सहयोग और क्षेत्रीय मुद्दों पर फोकस के साथ एस जयशंकर–लावरोव मुलाकात क्यों है रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण

भारत और रूस के बीच होने वाली आगामी बैठक को केवल एक राजनयिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मुलाकात, बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दौर में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम है।

इस बैठक का पहला पहलू यह है कि यह एससीओ और ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय ढांचों के पुनर्गठन की पृष्ठभूमि में हो रही है। दोनों ही मंच एशिया-केन्द्रित वैश्विक शक्ति संरचना का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में भारत और रूस की साझेदारी का मजबूत रहना इन मंचों की रणनीतिक दिशा तय करता है।

दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु ऊर्जा और रक्षा सहयोग है। रूस भारत का विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्तिकर्ता और सैन्य प्रौद्योगिकी साझेदार रहा है। मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत के लिए स्थिर ऊर्जा स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस बैठक में ऊर्जा सुरक्षा पर विस्तृत चर्चा होना तय है।

तीसरा पक्ष राजनीतिक सहयोग का भविष्य है। यूक्रेन संकट, मध्य एशिया की अस्थिरता, एशिया-प्रशांत में उभरते समीकरण और पश्चिमी देशों की नई नीतियाँ—इन सबके बीच भारत और रूस अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करना चाहते हैं। लावरोव और जयशंकर की बातचीत इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी होगी।

अंततः, यह मुलाकात संयुक्त राष्ट्र और जी-20 में सहयोग के नए आयाम खोल सकती है। भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनकर उभरा है, वहीं रूस पश्चिमी दबावों के बीच नए साझेदारों की तलाश में है।

इन सभी पहलुओं को देखते हुए, यह बैठक दोनों देशों के लिए भविष्य की रणनीति निर्धारित करने वाली साबित हो सकती है।

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