पहली बार DGP समेत 13 अफसर कटघरे में, सिस्टम की दीवारें हिल गईं!
वर्दी पर कलंक का केस,जब कानून के रखवाले ही आरोपियों की सूची में पहुंचे!

हाईलाइट
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वर्दी पर कलंक का केस — जब कानून के रखवाले ही आरोपियों की सूची में पहुंचे!”
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पहली बार कानून ने अपने ही मालिकों को घेरा — DGP समेत 13 अफसरों पर शिकंजा कसता जा रहा है!”
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न्याय का इतिहास पलटा — जब डीजीपी से नीचे नहीं, ऊपर तक हाथ पहुँचा!”
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कुर्सियाँ कांपीं, दीवारें गूंज उठीं — पहली बार DGP समेत 13 अफसरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज।
स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट | क्राइम इंडिया टीवी।
हरियाणा के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी पूरण कुमार की आत्महत्या ने पूरे तंत्र को हिला दिया है- वो अफसर जिसने अपने पूरे करियर में ईमानदारी की मिसाल दी, उसी को सिस्टम ने अंदर से तोड़ डाला।परिवार ने पोस्टमार्टम से इनकार किया और आखिर पुलिस को मजबूर होकर एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। इतिहास में पहली बार किसी राज्य के डीजीपी और एसपी समेत 13 वरिष्ठ अफसरों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज हुआ है। लेकिन सवाल सिर्फ एफआईआर का नहीं है सवाल उस व्यवस्था का है जो अपने ही अधिकारी को जीने नहीं देती।जब इंसाफ की कुर्सी ही अत्याचार का कारण बन जाए, तो उसे क्या कहें?” I.G पूरण कुमार ने अपने अंतिम पत्र में लिखा मैं बार-बार लिखता रहा, अदालत गया, अधिकारियों को बताया,लेकिन किसी ने सुना नहीं। मुझे अपमानित किया गया, अकेला छोड़ा गया।”
उनकी पीड़ा सिर्फ व्यक्तिगत नहीं थी, बल्कि उस तंत्र का प्रतिबिंब थी जहाँ न्याय मांगना ही अपराध बन जाता है।अब यह जांच उन ही लोगों के हाथ में है जिनके नाम आरोपों में हैं। क्या यह जांच निष्पक्ष होगी? क्या कभी कोई डीजीपी अपने ही खिलाफ सच्चाई लिखेगा?
यह एक एफआईआर नहीं, यह शासन की आत्मा पर चार्जशीट है- जब सिस्टम के सबसे ऊँचे अधिकारी पर केस दर्ज हो जाए, तो सवाल सिर्फ एक अफसर की मौत का नहीं पूरे शासन की साख का होता है। यह घटना यह साबित करती है कि सत्ता और प्रशासन अब इतना संवेदनहीन हो चुका है कि एक ईमानदार अफसर की चीखें भी फाइलों में गुम हो जाती हैं। सरकारें आती-जाती रहीं, लेकिन नौकरशाही का रवैया वही रहा सत्य बोलो तो निशाना बनो, चुप रहो तो बचो।”
जिस विभाग ने न्याय देना था, वही अत्याचार का मंच बन गया”आईजी पूरण कुमार महीनों से मानसिक उत्पीड़न की शिकायतें लिख रहे थे।उन्होंने विभागीय बैठकों में भी इस बात को उठाया। लेकिन जिन अधिकारियों पर सवाल थे, वही उनकी शिकायतों के निर्णायक बने बैठे रहे। यह कोई चूक नहीं, यह सुनियोजित चुप्पी थी। अगर अफसर बोल दे तो उसे मानसिक रूप से तोड़ दो यही नीति चल रही है। क्या इस नीति को लोकतंत्र कहा जा सकता है?
कानून किताबों में जिंदा है, लेकिन न्याय अब फाइलों में दम तोड़ रहा है”- सरकार और विभाग दोनों जानते थे कि पूरण कुमार किस मानसिक स्थिति से गुजर रहे हैं। फिर भी किसी मंत्री, किसी सचिव, किसी अधिकारी ने पहल नहीं की। कोई संवेदनशील आदेश नहीं आया, कोई सुरक्षा नहीं दी गई। और जब मौत हो गई तो प्रेस नोट जारी करके सबने अपने हाथ धो लिए। यह वही व्यवस्था है जो घटना के बाद बयान देती है, पर घटना से पहले चुप रहती है।
हर वो व्यक्ति जिसने इस अधिकारी के पत्र पढ़े हैं, वो जानता है कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक हत्या है। क्योंकि जब शिकायत करने वाला ही आरोपी बना दिया जाए, तो न्याय की उम्मीद मर जाती है। यह केवल पूरण कुमार का मामला नहीं, यह हर उस ईमानदार अफसर का दर्द है जो सत्ता के दबाव में कुचला जाता है।
सिस्टम की चुप्पी अब अपराध है जवाब चाहिए, जिम्मेदारी चाहिए- अब सिर्फ एफआईआर से काम नहीं चलेगा। सरकार को बताना होगा कि जांच कौन करेगा और कैसे करेगा।जब आरोपी खुद अफसर हों, तो जांच स्वतंत्र एजेंसी के हवाले की जानी चाहिए न्यायालय की निगरानी में। जब तक जांच खुली नहीं होगी, हर अधिकारी की ईमानदारी पर शक की परछाई बनी रहेगी।
हम यह नहीं पूछ रहे कि किसने गोली चलाई हम यह पूछ रहे हैं कि किसने उसे जीने नहीं दिया” यह वक्त भावनाओं का नहीं, निर्णयों का है। अगर एक अधिकारी न्याय न पा सका, तो जनता क्या उम्मीद रखे?
इस केस ने सिद्ध कर दिया कि सत्ता और सिस्टम की मिलीभगत ने इंसानियत का गला घोंट दिया है। और जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, हर आईएएस-आईपीएस ऑफिसर के माथे पर यह दाग रहेगा कि उन्होंने अपने ही साथी को मरने दिया।
“सरकार सुन ले यह खामोशी अब सन्नाटा नहीं, तूफान बनने जा रही है अगर इस केस को दबाया गया- अगर जांच को धीमा किया गया,अगर सच्चाई छुपाई गई तो यह जनता के विश्वास पर आखिरी प्रहार होगा। सिस्टम का डर अब खत्म हो चुका है अब लोग जवाब मांगेंगे, और खुलकर मांगेंगे।
हर फाइल, हर ईमेल, हर नोटिंग,अब जनता के सामने लानी होगी। छिपाने की कोशिश भी गुनाह मानी जाएगी। इस केस का फैसला सिर्फ अदालत में नहीं, इतिहास में लिखा जाएगा”जो अफसर आज कुर्सियों पर बैठे हैं, वो याद रखें कुर्सी बच सकती है, पर चरित्र नहीं। अगर इस बार भी सबूत दबा दिए गए,तो आने वाली पीढ़ियाँ इस दिन को याद रखेंगी जब एक ईमानदार अधिकारी को सिस्टम ने मार दिया और सरकारें प्रेस नोट जारी करती रहीं।
अब बस एक ही मांग पारदर्शी जांच, सार्वजनिक रिपोर्ट, और दोषियों की गिरफ्तारी।
अब कोई और देरी नहीं। अब कोई और औपचारिकता नहीं। पूरण कुमार के परिवार को सम्मान चाहिए, और देश को उदाहरण चाहिए।न्याय को अब दिखना होगा क्योंकि अगर न्याय छिपा,तो आने वाला इतिहास लिखेगा “भारत में कानून नहीं, कुर्सियाँ फैसला करती हैं।



