
🗳️ बिहार विधानसभा चुनाव 2025: पहली चरण की जंग का पूरा चित्र
पटना से शुरू हुई बिहार की राजनीति की यह नई सुबह राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाली मानी जा रही है। बिहार की कुल 243 विधानसभा सीटों में से आधी यानी 121 सीटों पर पहले चरण का मतदान जारी है। सुबह से ही मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की लंबी कतारें दिखाई दीं और लोग लोकतंत्र के इस पर्व में भाग लेने के लिए उत्साहित नजर आए। राज्य में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) एक बार फिर से सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रहा है, जबकि विपक्षी महागठबंधन ने भी नीतीश सरकार को कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर रखी है।
मतदान की शुरुआत और रुझान
सुबह 9 बजे तक 13.13 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। शुरुआती चरण में कई प्रमुख नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर मतदान किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वोट डालने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों से अपील की कि वे भी मतदान करें और दूसरों को प्रेरित करें। उनके साथ ही उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और लोजपा के चिराग पासवान ने भी अपने मताधिकार का उपयोग किया।
लालू प्रसाद यादव ने अपने परिवार की स्याही लगी उंगलियों की तस्वीर साझा करते हुए कहा कि “तवा पर रोटी को पलटते रहना चाहिए, वरना जल जाएगी। बीस साल बहुत होते हैं, अब युवाओं की सरकार जरूरी है।” इस संदेश के जरिए उन्होंने नीतीश कुमार के लंबे शासन पर कटाक्ष किया और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में परिवर्तन का आह्वान किया।
नेताओं के दावे और अपीलें
एनडीए की ओर से उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विश्वास जताया कि गठबंधन भारी बहुमत से सत्ता में लौटेगा। उन्होंने कहा कि जनता विकास, स्थिरता और सुशासन के लिए वोट कर रही है। वहीं, चिराग पासवान ने भी लोगों से रिकॉर्ड मतदान करने की अपील की और कहा कि हर नागरिक को अपने वोट के अधिकार का उपयोग जरूर करना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहारवासियों से अपील की कि वे लोकतंत्र के इस महापर्व में पूरे उत्साह से भाग लें। उन्होंने विश्वास जताया कि बिहार की जनता एक बार फिर एनडीए पर भरोसा जताएगी और अभूतपूर्व बहुमत से सरकार बनाएगी।
महागठबंधन की रणनीति और उम्मीदें
महागठबंधन, जिसमें राजद, कांग्रेस और वाम दल शामिल हैं, इस चुनाव को जनाक्रोश के रूप में देख रहा है। उनका कहना है कि राज्य में बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पिछले 20 वर्षों से अनसुलझे हैं। तेजस्वी यादव इस बार युवाओं के मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने वादा किया है कि उनकी सरकार बनने पर “हर घर से एक सरकारी नौकरी” दी जाएगी, जिससे लगभग 1.3 करोड़ युवाओं को रोजगार मिलेगा। उनका कहना है कि यह योजना युवाओं को राज्य में ही अवसर देगी और पलायन की समस्या कम होगी।
2020 के चुनाव में राजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, लेकिन बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई थी। तेजस्वी यादव अब उस अधूरे जनादेश को पूरा करने के लिए पूरी ताकत से मैदान में हैं।
एनडीए की रणनीति और नेतृत्व का सवाल
भाजपा ने इस बार भी अपना परंपरागत हाई-प्रोफाइल प्रचार अभियान चलाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दर्जनों रैलियां कीं और जनसभाओं में विकास के मुद्दे को प्रमुखता दी। इस बीच चर्चा यह भी थी कि 74 वर्षीय नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है और भाजपा अपना चेहरा आगे ला सकती है। लेकिन गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने स्पष्ट किया कि नीतीश कुमार ही एनडीए के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। इससे जदयू के कार्यकर्ताओं में राहत की भावना दिखी।
कांग्रेस की स्थिति
महागठबंधन की सहयोगी कांग्रेस इस बार कमजोर कड़ी के रूप में देखी जा रही है। 2020 में वह आरजेडी से काफी पीछे रह गई थी। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संयुक्त रूप से चुनाव अभियान की शुरुआत की थी, लेकिन राहुल गांधी लंबे समय तक प्रचार से दूर रहे। इससे कांग्रेस की उपस्थिति कमजोर मानी जा रही है। पार्टी को उम्मीद है कि उसके पारंपरिक वोट बैंक में अब भी भरोसा बना रहेगा।
जन सुराज पार्टी का उभार
इस चुनाव में सबसे रोचक चेहरा राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर का है, जिन्होंने “जन सुराज” नाम से अपनी पार्टी बनाई है। उन्होंने राज्य की हर सीट पर उम्मीदवार उतारे हैं। उनका कहना है कि उनकी पार्टी या तो 10 से कम या 150 से ज्यादा सीटें जीतेगी। उन्होंने किसी भी दल से गठबंधन करने से इनकार किया है। प्रशांत किशोर ने भ्रष्टाचार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में गिरावट को मुख्य मुद्दा बनाया है। उनका उद्देश्य है कि बिहार में राजनीतिक संस्कृति बदली जाए और लोगों को नीति आधारित शासन मिले।
चुनावी मुद्दे
इस चुनाव में मुख्य मुद्दे वही पुराने हैं — रोटी, रोजगार, भ्रष्टाचार, शिक्षा और स्वास्थ्य। बेरोजगारी अब भी सबसे बड़ा चुनावी विषय बना हुआ है। तेजस्वी यादव ने जहां एक ओर हर घर नौकरी देने का वादा किया है, वहीं एनडीए ने अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए कहा है कि पिछले वर्षों में राज्य ने विकास के नए मानक बनाए हैं। नीतीश कुमार का कहना है कि बिहार की आर्थिक स्थिति में निरंतर सुधार हुआ है और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में राज्य ने उदाहरण प्रस्तुत किया है।
एनडीए ने अपने घोषणापत्र में एक करोड़ रोजगार देने और “लखपति दीदी” योजना के तहत महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का वादा किया है। वहीं विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ चुनावी जुमले हैं और इन योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचा।
पहले चरण के मतदान वाले क्षेत्र
आज जिन 121 सीटों पर मतदान हो रहा है, वे ज्यादातर मध्य बिहार के इलाके हैं — पटना, गया, नालंदा, जहानाबाद, औरंगाबाद और भोजपुर जिले के कुछ हिस्से। 2020 में इन क्षेत्रों में महागठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया था, जब उसने 63 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा और जदयू मिलकर 55 सीटों तक ही सीमित रह गए थे। इस बार भी इन इलाकों में मुकाबला कांटे का माना जा रहा है।
मतदाताओं का उत्साह
ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही। मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें लगीं और पहली बार वोट डालने वाले युवा विशेष उत्साह में नजर आए। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। ईवीएम मशीनों की जांच, वीवीपैट की व्यवस्था और कोविड जैसी बीमारियों से सुरक्षा के दिशा-निर्देशों का पालन किया गया।
बिहार का भविष्य किसके हाथ?
यह चुनाव बिहार के लिए निर्णायक माना जा रहा है। नीतीश कुमार, जिन्होंने 20 वर्षों तक राज्य की बागडोर संभाली, अब एक बार फिर जनता के सामने हैं। उनका दावा है कि उन्होंने बिहार को अंधकार से निकालकर विकास की दिशा में आगे बढ़ाया है। वहीं विपक्ष कह रहा है कि यह विकास केवल आंकड़ों में है, जमीनी हकीकत में नहीं।
युवाओं की बड़ी संख्या इस बार निर्णायक भूमिका निभा सकती है। उनके लिए रोजगार, शिक्षा और पलायन सबसे अहम मुद्दे हैं। महिलाओं के लिए सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार भी एक बड़ा प्रश्न है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि बिहार की दिशा बदलने का चुनाव माना जा रहा है।
निष्कर्ष
पहले चरण के मतदान ने यह साफ कर दिया है कि जनता में उत्साह है और परिवर्तन की चर्चा हर गांव-शहर में हो रही है। जहां एक ओर नीतीश कुमार अपनी उपलब्धियों के सहारे सत्ता में लौटना चाहते हैं, वहीं तेजस्वी यादव युवाओं के सपनों को अपने घोषणापत्र में जगह देकर नई उम्मीदें जगा रहे हैं। भाजपा संगठनात्मक ताकत के बल पर मैदान में है, जबकि प्रशांत किशोर जैसे नए चेहरे ने चुनाव में अप्रत्याशित तत्व जोड़ दिया है।
अब यह देखना होगा कि क्या बिहार की जनता एक बार फिर पुराने नेतृत्व पर भरोसा करती है या इस बार बदलाव का बटन दबाती है। मतदान के पहले चरण ने इस राजनीतिक संघर्ष को और रोमांचक बना दिया है, और आने वाले चरणों में यह मुकाबला और तीखा होता दिख रहा है।



