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अंग्रेजी नोटिस के नाम पर डर का खेल! प्राइवेट फाइनेंस कंपनियों की भाषा से पिस रहा गरीब और मध्यम वर्ग।

अंग्रेजी नोटिस के नाम पर गरीबों को डराने का खेल!

क्या आम आदमी को जानबूझकर कानूनी जाल में फंसाया जा रहा है?

जिस नोटिस को जनता पढ़ न सके, वह सूचना नहीं डर है!

जयपुर। देशभर में प्राइवेट बैंक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों की कार्यप्रणाली अब बड़े सवालों के घेरे में है। गांव-कस्बों और छोटे शहरों के लाखों लोगों को लोन तो आसानी से दे दिए जाते हैं, लेकिन जब रिकवरी, डिफॉल्ट या कानूनी कार्रवाई की बारी आती है तो नोटिस पूरी तरह अंग्रेजी में भेजे जाते हैं। ग्रामीण और सामान्य परिवारों के हजारों लोगों को अंग्रेजी समझ नहीं आती।
ऐसे में उन्हें यह तक समझ नहीं आता कि नोटिस में लिखा क्या है  कितना बकाया है, कितने दिन का समय है, आगे क्या कार्रवाई होगी, और उनके कानूनी अधिकार क्या हैं। नतीजा यह होता है कि गरीब और मध्यम वर्ग का व्यक्ति डर और मानसिक तनाव में बैंक, रिकवरी एजेंट और वकीलों के चक्कर काटता रहता है। कई मामलों में लोग केवल नोटिस समझने के लिए हजारों रुपये वकीलों को देने पर मजबूर हो जाते हैं।

क्या यह व्यवस्था आम आदमी को डराने के लिए बनाई गई है?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब:
लोन स्थानीय भाषा में समझाया जाता है,
EMI गांव के लोगों को हिंदी में बताई जाती है, रिकवरी एजेंट स्थानीय बोली में बात करते हैं,तो कानूनी नोटिस केवल अंग्रेजी में क्यों भेजे जाते हैं?क्या आम आदमी को कानूनी प्रक्रिया से अनजान रखकर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है?
संविधान और उपभोक्ता अधिकार क्या कहते हैं?

भारत का संविधान और उपभोक्ता अधिकार व्यवस्था इस बात की भावना को समर्थन देती है कि नागरिक को उसकी समझ की भाषा में जानकारी मिले। कई न्यायालय समय-समय पर टिप्पणी कर चुके हैं कि न्याय और प्रशासन जनता की भाषा में होना चाहिए।इसके बावजूद अधिकतर प्राइवेट फाइनेंस कंपनियां केवल अंग्रेजी नोटिस भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अंग्रेजी नोटिस भेजना पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।आम उपभोक्ता भ्रमित होकर गलत सलाह का शिकार हो सकता है।RBI और सरकार को हिंदी एवं स्थानीय भाषा में नोटिस अनिवार्य करने चाहिए।

जनता की मांग
सभी बैंक और फाइनेंस कंपनियों के लिए हिंदी + स्थानीय भाषा में नोटिस अनिवार्य हों। नोटिस में सरल भाषा में “अब आगे क्या होगा” स्पष्ट लिखा जाए।रिकवरी एजेंटों की मनमानी पर सख्त निगरानी हो। उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त हेल्पलाइन और कानूनी सहायता उपलब्ध हो। RBI और केंद्र सरकार इस विषय पर राष्ट्रीय गाइडलाइन जारी करे।

सरकार और सिस्टम से बड़ा सवाल
जब देश डिजिटल इंडिया और मातृभाषा की बात कर रहा है, तो वित्तीय संस्थाओं में अंग्रेजी आधारित कानूनी दबाव क्यों? आखिर आम आदमी कब तक भाषा के नाम पर डर और शोषण झेलेगा?
“जिस नोटिस को गरीब पढ़ ही नहीं सकता, वह उसके लिए सूचना नहीं… डर और दबाव का हथियार बन जाता है।”

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