सरकारी नौकरी या सौदा? पंजाब में नकल का खेल, कर्नाटक में ₹80 लाख की मांग का आरोप।
योग्यता बनाम पैसा: पंजाब-कर्नाटक की भर्ती परीक्षाओं पर क्यों मचा है सियासी घमासान?


क्राइम इंडिया TV | नेशनल डेस्क। देश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पंजाब और कर्नाटक से सामने आए दो अलग-अलग मामलों ने भर्ती व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है। हालांकि दोनों मामलों की प्रकृति अलग है और कर्नाटक के आरोपों की जांच/स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।
पंजाब में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के 454 फार्मेसी ऑफिसर पदों की भर्ती परीक्षा में हाईटेक नकल का मामला सामने आया। पुलिस कार्रवाई में 28 अभ्यर्थियों समेत कुल 35 लोगों को हिरासत में लिया गया और 27 बैटरी संचालित वायरलेस उपकरण बरामद किए गए।
जांच में सामने आया कि गिरोह कथित तौर पर पेन कैमरा, वायरलेस डिवाइस और ब्लूटूथ उपकरणों के जरिए अभ्यर्थियों तक उत्तर पहुंचाने की व्यवस्था कर रहा था। रिपोर्टों के अनुसार अभ्यर्थियों से नकल कराने के बदले ₹13 लाख तक लेने की बात सामने आई है। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक प्रश्नपत्र लीक होने या परीक्षा अधिकारियों/सरकारी कर्मचारियों की भूमिका सामने नहीं आई है। इस प्रकरण के बाद पंजाब कांग्रेस ने भी राज्य की AAP सरकार को घेरते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
कर्नाटक: पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती में ₹80 लाख की मांग का आरोप।
दूसरा मामला कांग्रेस शासित कर्नाटक से सामने आया है। KPSC के माध्यम से 400 पशु चिकित्सा अधिकारी पदों की भर्ती में कुछ अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया है कि अंतिम चयन प्रभावित करने के लिए बिचौलियों द्वारा ₹80 लाख तक की मांग की गई। इनमें 342 नियमित और 58 बैकलॉग पद बताए गए हैं।
अभ्यर्थियों ने कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरें और वीडियो सामने लाने का दावा करते हुए बेंगलुरु में प्रदर्शन किया और निष्पक्ष जांच की मांग की। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ₹80 लाख में नौकरी बेचे जाने का दावा अभी आरोप है; इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और प्रकाशित रिपोर्ट के समय KPSC की तत्काल प्रतिक्रिया भी सामने नहीं आई थी।
युवाओं के सवालों का जवाब जरूरी
पंजाब में पुलिस द्वारा पकड़ा गया हाईटेक नकल नेटवर्क हो या कर्नाटक में भर्ती को प्रभावित करने के लिए ₹80 लाख मांगने के आरोप—दोनों घटनाएं सरकारी नौकरियों की तैयारी में वर्षों लगाने वाले युवाओं के भरोसे से जुड़ी हैं।
लेकिन इन्हें सीधे राहुल गांधी या अरविंद केजरीवाल द्वारा किया गया “भर्ती घोटाला” कहना उपलब्ध तथ्यों से प्रमाणित नहीं होता। जिम्मेदारी तय करना जांच एजेंसियों और उपलब्ध साक्ष्यों का विषय है। राजनीतिक दलों से सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि उनकी सरकारों में भर्ती प्रक्रिया की शुचिता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।सवाल सत्ता किसी की भी हो, एक ही होना चाहिए—मेहनत और योग्यता के भरोसे परीक्षा देने वाले युवाओं के अधिकार और भविष्य की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?



