एक्सक्लूसिव खबरेंदिल्ली एनसीआर
Trending
छात्र आंदोलन या मर्यादा की सीमा पार करता विरोध? किताबें सवाल करना सिखाती हैं, गाली और हिंसा नहीं…?
जंतर-मंतर प्रदर्शन के बीच उठे गंभीर सवाल; लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण, लेकिन भाषा, व्यवहार और असहमति की भी हो मर्यादा।


क्राइम इंडिया TV डिजिटल डेस्क| नई दिल्ली।देश की राजधानी दिल्ली में शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शन ने युवाओं की नाराजगी को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। जंतर-मंतर से संसद की ओर निकले मार्च में बड़ी संख्या में छात्र, युवा और अन्य लोग शामिल हुए। प्रदर्शन के दौरान “जय भीम” सहित विभिन्न नारे भी सुनाई दिए। पुलिस ने संसद की ओर बढ़ती भीड़ को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की और हालात कई स्थानों पर तनावपूर्ण हो गए।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सोशल मीडिया पर अनेक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहे हैं। कुछ वीडियो में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव तो कुछ में लोगों के बीच विवाद और मारपीट जैसे दृश्य दिखाई देने के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि प्रत्येक वायरल वीडियो की जगह, समय, परिस्थितियों और उसमें दिखाई दे रहे लोगों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
लेकिन इन तस्वीरों के बीच एक बड़ा सामाजिक सवाल जरूर सामने आता है।क्या विद्यार्थी आंदोलन की पहचान गाली, अश्लीलता और हिंसा होनी चाहिए?
बिल्कुल नहीं।
छात्रों को सरकार से सवाल करने, व्यवस्था की कमियां सामने रखने, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता मांगने और अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन आंदोलन चाहे किसी भी विचारधारा, संगठन या मांग से जुड़ा हो गाली-गलौज, व्यक्तिगत अपमान, अश्लील भाषा, उकसावा और हिंसा किसी लोकतांत्रिक आंदोलन की ताकत नहीं हो सकते। किताबें केवल परीक्षा पास करना और नौकरी हासिल करना नहीं सिखातीं। शिक्षा व्यक्ति को तर्क, अनुशासन, संस्कार, संवैधानिक मर्यादा और दूसरे व्यक्ति की असहमति का सम्मान करना भी सिखाती है।
नारा कोई भी हो, हिंसा स्वीकार्य नहीं
“जय भीम”, “जय हिंद”, “भारत माता की जय” अथवा किसी अन्य शांतिपूर्ण और संवैधानिक अभिव्यक्ति को लेकर किसी व्यक्ति के साथ मारपीट करना स्वीकार्य नहीं हो सकता। उसी प्रकार किसी आंदोलन या विचारधारा की आड़ लेकर दूसरे व्यक्ति को अपशब्द कहना, धमकाना अथवा हिंसा के लिए उकसाना भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।
विचार का जवाब विचार से होना चाहिए, सवाल का जवाब तर्क से और कानून तोड़ने वाले का फैसला कानून से होना चाहिए—भीड़ से नहीं। यदि वायरल वीडियो में दिखाई देने वाले किसी व्यक्ति के साथ पुलिस की मौजूदगी में मारपीट हुई है तो पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषी कौन है, इसका निर्णय वीडियो के कुछ सेकंड या सोशल मीडिया की राय से नहीं बल्कि तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।
असली मुद्दे शोर में न खो जाएं
देश के युवाओं के सामने परीक्षा की पारदर्शिता, पेपर लीक, रोजगार और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर सवाल हैं। इन मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगना लोकतंत्र का हिस्सा है।लेकिन आंदोलन में यदि अपशब्द, अश्लीलता, हिंसा या व्यक्तिगत हमले प्रवेश कर जाते हैं तो वास्तविक मुद्दे पीछे छूटने लगते हैं।युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी ताकत है। इस ताकत का सबसे प्रभावशाली स्वरूप वह है जिसमें हाथों में किताबें हों, जुबान पर सवाल हों, तथ्यों में ताकत हो और व्यवहार में मर्यादा हो।
क्राइम इंडिया TV की संपादकीय टिप्पणी
विरोध कीजिए। सरकार से कठिन सवाल पूछिए। व्यवस्था की कमियों को उजागर कीजिए। अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद कीजिए। लेकिन विरोध इतना मर्यादित अवश्य रहे कि देश के छात्र और युवा समाज के सामने शिक्षा, संस्कार और लोकतांत्रिक चेतना का उदाहरण प्रस्तुत करें।….क्योंकि किताबें सवाल करना सिखाती हैं—अश्लीलता नहीं। शिक्षा अधिकारों के लिए लड़ना सिखाती है।दूसरे के अधिकार कुचलना नहीं।
और लोकतंत्र असहमति का अधिकार देता है—हिंसा का नहीं।




